ताइवान पर भारत की दुविधा


भारत की विदेश नीति के सामने एक बड़ी दुविधा आ फंसी है। भारत शीघ्र ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) का अध्यक्ष बननेवाला है। उसके पहले इस संगठन के संचालक मंडल की बैठक होनेवाली है। इस बैठक में ताइवान पर्यवेक्षक की तरह शामिल हो, ऐसा कई देश चाहते हैं जबकि चीन इसके बिल्कुल विरुद्ध है, क्योंकि वह ताइवान को अपना एक प्रदेश भर मानता है।

ताइवान पर भारत की दुविधा


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भारत की विदेश नीति के सामने एक बड़ी दुविधा आ फंसी है। भारत शीघ्र ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) का अध्यक्ष बननेवाला है। उसके पहले इस संगठन के संचालक मंडल की बैठक होनेवाली है। इस बैठक में ताइवान पर्यवेक्षक की तरह शामिल हो, ऐसा कई देश चाहते हैं जबकि चीन इसके बिल्कुल विरुद्ध है, क्योंकि वह ताइवान को अपना एक प्रदेश भर मानता है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, कई यूरोपीय देश और कुछ लातीनी अमेरिकी देश भी चाहते हैं कि ताइवान भी उस बैठक में भाग ले और इस विश्व संगठन को वह वे रहस्य बताए, जिनके चलते उसने कोरोना पर जबर्दस्त काबू पाया। यहां भारत के लिए सवाल यह है कि इस मुद्दे पर वह किसका समर्थन करे, चीन का या ताइवान का ?

ताइवान ढाई करोड़ लोगों का देश है। कुछ वर्ष पहले एक सप्ताह के लिए मैं ताइवान सरकार का मेहमान भी रहा हूं। वहां के शीर्ष नेताओं और विद्वानों के साथ बातचीत करने पर पता चला कि ताइवानी लोग भारत से बहुत प्रेम रखते हैं। उनके संस्थापक नेता च्यांग-काई शेक से भारत का गहरा संबंध रहा है लेकिन भारत ने आज तक उसको राष्ट्र के रुप में मान्यता नहीं दी है लेकिन दोनों देशों की राजधानियों में दोनों के आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र बने हुए हैं। पिछले 25 साल से ये केंद्र ही राजदूतावास की तरह काम कर रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन में ताइवान को पर्यवेक्षक की हैसियत 2009 से 2016 तक मिली हुई थी। चीन ने उस समय उसका विरोध इसलिए नहीं किया, क्योंकि ताइवान की तत्कालीन क्वोमिंतांग सरकार और चीन के संबंध ठीक-ठाक थे लेकिन 2016 में डेमोक्रेटिक पीपल्स पार्टी के त्साई इंग वेन ताइवान के राष्ट्रपति चुन लिए गए, जो ताइवान को सार्वभौम और स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करवाना चाहते थे। पिछले दिनों चीन के खिलाफ ताइवान में अभूतपूर्व प्रदर्शन भी हुए थे। 

कई पश्चिमी देश ताइवान को विश्व स्वास्थ्य संगठन में इसलिए भी बुलाना चाहते हैं कि कोरोना को लेकर चीन और उनके बीच भयंकर शीतयुद्ध चल पड़ा है। वे चीन से करोड़ों-अरबों डालरों का हर्जाना भी मांग रहे हैं और अमेरिका-जैसे राष्ट्र विश्व-स्वास्थ्य संगठन के वर्तमान अधिकारियों को चीनपरस्त भी मानते हैं। 

भारत दोनों पक्षों से अपने संबंध सहज रखना चाहता है। भावी अध्यक्ष के नाते वह किसी एक का पक्षधर बने, यह उचित नहीं है। बीच का एक रास्ता मेरे दिमाग में है लेकिन हमारे विदेश मंत्रालय के दिमाग में कई रास्ते होंगे। देखें, क्या होता है ?
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं! वे चीन और ताइवान की यात्राऐं कई बार कर चुके हैं)

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