घर लौटने के लिए बस की राह देखते मजदूर


आर्थिक पैकेज की घोषणाएं लंबे दौर में लाभदायक हो सकती हैं, पर पीड़ितों को सरकारी मदद अभी चाहिए थी। जिस राहत का इंतजार था वह तो मिली नहीं पिछले हफ्ते जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपना संदेश प्रसारित किया तो करोड़ों लोगों को यह आशा बंध गई थी कि अब उन्हें कोरोना-संकट से तत्काल राहत मिलेगी।

घर लौटने के लिए बस की राह देखते मजदूर


आर्थिक पैकेज की घोषणाएं लंबे दौर में लाभदायक हो सकती हैं, पर पीड़ितों को सरकारी मदद अभी चाहिए थी। जिस राहत का इंतजार था वह तो मिली नहीं पिछले हफ्ते जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपना संदेश प्रसारित किया तो करोड़ों लोगों को यह आशा बंध गई थी कि अब उन्हें कोरोना-संकट से तत्काल राहत मिलेगी। सरकार ऐसी घोषणाएं करेगी, जिनसे सड़कों पर दम तोड़ते प्रवासी मजदूरों की समस्या हल होगी, काम-धंधे फिर चालू हो सकेंगे और देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था नए सिरे से अपने पांवों पर खड़ी हो जाएगी। लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में आत्मनिर्भर भारत का नारा लगाया और 20 लाख करोड़ रुपये की राहत देने का काम वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के कंधों पर डाल दिया। कई अर्थशास्त्रियों ने हिसाब लगाकर बताया कि 20 लाख करोड़ का दावा सिर्फ एक छलावा है। इसमें वे लगभग 18 लाख करोड़ रुपये भी शामिल हैं, जो इस साल के बजट में ही घोषित कर दिए गए थे, या उसके बाद कई मदों के लिए दिए गए थे। 

सरकार ने दावा किया कि यह राहत देश के सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत है जबकि अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह मुश्किल से उसका 2 प्रतिशत है। इस राहत को सकल घरेलू उत्पाद का 10 प्रतिशत बताने से ऐसा लगता है मानो भारत अमेरिका, कनाडा और जर्मनी आदि देशों की बराबरी कर रहा है। लेकिन असलियत क्या है, असलियत यह है कि 20 लाख करोड़ रुपये की इस राहत का संबंध कोरोनाजन्य तात्कालिक समस्याओं से बहुत कम है। पिछले 6 साल में बीजेपी सरकार देश की अर्थव्यवस्था में जो छोटे-मोटे सुधार करना चाहती थी और उन्हें नहीं कर पाई थी, इस मौके पर उसने उनकी घोषणा कर दी। दूसरे शब्दों में कहें तो यह वार्षिक बजट का एक अगला प्रचारात्मक पहलू था।

इसका अर्थ यह नहीं कि वित्तमंत्री की ये घोषणाएं सर्वथा निरर्थक थीं। इनमें कई सुप्रतीक्षित मांगों को संबोधित किया गया। जैसे किसान दशकों से मांग कर रहे थे कि उन्हें कृषि मंडी समितियों की घेरेबंदी से मुक्ति दिलाई जाए। उन्हें बाध्य किया जाता था कि वे अपने इलाके के लायसेंसधारी दलालों के जरिए ही अपना माल स्थानीय मंडियों में बेचें। इसके कारण उन्हें कई बार कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती थी। अब वे इसको जहां चाहें, बेच सकते हैं। चाहें तो अपनी फसलें निर्यात भी कर सकते हैं। सरकार ने माल भाड़े में छूट देने का भरोसा भी दिलाया है। अभी हमारा कृषि-निर्यात 2.6 लाख करोड़ रुपये का है। उसे बढ़ाकर 10 लाख करोड़ तक पहुंचाया जा सकता है।

प्रश्न यह है कि इन राहतों का वर्तमान संकट से क्या संबंध है, इस समय सब्जियों, फलों और फूलों की जो फसलें खेतों में पड़ी सड़ रही हैं, उनका हल क्या है। उनके मजदूर कोरोना के डर से भाग खड़े हुए हैं, उन्हें कैसे लौटाया जाए जो मंडियां अभी तक बंद थीं, उन्होंने किसानों की जेबें खाली कर दी हैं। यदि उन्हें 500 रुपया महीना यानी 17-18 रुपया रोज की राहत दे रहे हैं तो उसका अर्थ क्या है। किसान को तो अपने मजदूर को रोजाना 200-250 रुपये देने होते हैं। बेरोजगार गैर-सरकारी कर्मचारियों को ब्रिटिश सरकार घर बैठे उनकी 80 प्रतिशत तनख्वाह दे रही है और अमेरिका, कनाडा तथा जर्मनी की सरकारें अपने नागरिकों को सैकड़ों डॉलर प्रति माह का बेकारी भत्ता दे रही हैं। भारत सरकार भी दो-तीन माह के लिए कमोबेश ऐसा ही कदम क्यों नहीं उठा सकती।

लघुतर, लघु और मध्यम उद्योगों को 3 लाख करोड़ रुपये की राहत का मामला भी ऐसा ही है। इन उद्योगों में काम करनेवाले 12 करोड़ से ज्यादा मजदूरों को कौन सी राहत मिलने वाली है।  वे लोग तो वेतन के अभाव में अपने गांवों की तरफ भाग रहे हैं। यदि तालाबंदी के दिनों में आप उन्हें उनका पूरा वेतन सरकार की तरफ से देने की घोषणा कर देते तो उनका यह दर्दनाक पलायन रुक जाता। और जहां तक लघु उद्योपतियों का संबंध है, आप उन्हें तश्तरी में रखकर कुछ भी भेंट नहीं कर रहे। आप उन्हें 3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दे रहे हैं। कौन देगा, यह कर्ज, सरकारी बैंक, जिन्होंने पहले ही इनमें से कई उद्योगपतियों को कर्ज दे रखा है। प्रश्न यह है कि ये उद्योग और नया कर्ज क्यों लेंगे, मान लीजिए, कर्ज लेकर बैठ जाएं क्योंकि कुछ गिरवी नहीं रखना, लेकिन उस कर्ज का करेंगे क्या।

पहली बात तो यह कि क्या सिर्फ पूंजी और मशीनों से कारखाने चल पड़ेंगे, जब मजदूर ही नहीं होंगे तो कारखाने चलेंगे कैसे,  इससे भी बड़ी एक और समस्या है। मजदूरों की वापसी हो जाए और कारखानों में माल भी बनने लगे, तो भी असली सवाल यह है कि उसे खरीदेगा कौन, बाजार में मांग होगी, तभी तो माल बिकेगा। और मांग तब होगी, जब लोगों की जेब में पैसा होगा। लोगों तक पैसा पहुंचाने का काम हमारी सरकार ने ना के बराबर किया है। यह उसने अच्छा फैसला किया कि प्रवासी मजदूरों को अगले दो माह तक खाद्यान्न मुफ्त देगी, लेकिन इसका उलटा असर भी हो सकता है। यदि उन्हें ‘मनरेगा’ के तहत 202 रुपये रोज मिलें और मुफ्त खाद्यान्न भी तो वे शहर क्यों लौटना चाहेंगे दूसरे शब्दों में, इस राहत का लाभ लघु उद्योगों को इन दिनों मिल पाएगा, इसमें संदेह है।

गांवों से प्रवासी मजदूरों की वापसी में अब एक नई बाधा कई राज्यों ने उत्पन्न कर दी है। उन्होंने श्रमिक कानून में ऐसे संशोधन कर दिए हैं, जिनसे उनकी नौकरियां असुरक्षित हो गई हैं और काम के घंटे बढ़ गए हैं। चीन से उखड़े विदेशी उद्योगपतियों को भारत लाने का यह पैंतरा है। लेकिन ऐसी औद्योगिक प्रगति किस काम की, जिसमें इंसानियत कुर्बान हो जाए, वित्तमंत्री की घोषणाओं में मजदूरों, किसानों, रेहड़ीवालों, छोटे व्यापारियों और समाज के वंचित वर्गों के लिए कुछ अन्य सराहनीय पहल भी हैं, लेकिन कोरोना-संकट का तत्काल सामना करने की दृष्टि से वे प्रासंगिक प्नहीं लगतीं। अभी भी मौका है, दुनिया के कई देशों से सीखकर सरकार प्रासंगिक पहल कर सकती है।

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