जानें क्या है बेवर खेती, क्यों इसकी फ़सल कभी धोखा नहीं देती?


मौसम चाहे जैसा भी हो इस फसल से इतना पैदावार किया जा सकता है जिससे गुज़ारा चल सके। इस खेती को कहते हैं बेवर खेती। मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ आदिवासी इलाके के लोग इस तरीके की खेती करते हैं।

जानें क्या है बेवर खेती, क्यों इसकी फ़सल कभी धोखा नहीं देती?


आधुनिक तरीके से की जाने वाली खेती में फसल के नुकसान होने का खतरा रहता है। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि फसल खराब हो जाती है और पूरी लागत डूब जाती है। लेकिन खेती करने का एक ऐसा भी तरीका है जिसमें ज़मीन की बिना जुताई किए फसल पैदा की जाती है और यह फसलें धोखा नहीं देती है।

मौसम चाहे जैसा भी हो इस फसल से इतना पैदावार किया जा सकता है जिससे गुजारा चल सके। इस तरीके को कहते हैं बेवर खेती। मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ आदिवासी इलाके के लोग इस तरीके की खेती को करते हैं।

ब्रिटिश सरकार में जंगल की कटाई का हवाला देते हुए आदिवासियों के पारंपरिक बेवर या झूम खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन उस वक्त मध्य प्रदेश के 7 गांवों को 2336 एकड़ के इलाके में इस तरीके की खेती की छूट थी। 1927 में वन कानून बनने के बाद यह छूट वापस ले ली गई। लेकिन बेवर खेती की परंपरा तमाम प्रतिबंधों के बाद भी छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों में फल-फूल रही है। इस खेती की सबसे खास बात यह है कि इसमें किसानों को कभी नुकसान नहीं होता है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ सुदूर इलाके जहां पर मौसम विभाग की जानकारी तक नहीं पहुंचती हैं। ऐसे में गांव में अगर घुर्घूटी कीड़ा निकलता है। तो गांव के लोग यह समझ लेते हैं की इस साल बारिश अच्छी होगी। हैरान करने वाली बात यह है की आदिवासी इलाकों में मौसम के अनुमान लगाने का जो पारंपरिक तरीका है। वो शत प्रतिशत सही होता है। यहां पर रहने वाले आदिवासी बिना खेत की जुताई कर के कंदमूल फलों के बीजों को लगाते हैं। ये वो कंद-मूल हैं, जिन्हें खाकर पर्याप्त पोषण तो मिलता ही है, तरह-तरह की बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है।