काबुलः भारत-पाक पहेलियाँ


अफगानिस्तान से फौजी वापसी की इच्छा ओबामा और ट्रंप, दोनों प्रशासनों ने व्यक्त की थी और उसके आधार पर अमेरिकी जनता के वोट भी जुटाए थे लेकिन तालिबान को शक है कि अमेरिका अफगानिस्तान में डटे रहना चाहता है।

काबुलः भारत-पाक पहेलियाँ


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

यह गनीमत है कि ईद के मौके पर अफगानिस्तान के तालिबान और सरकार ने अगले तीन दिन के लिए युद्ध-विराम की घोषणा कर दी है। पिछली 1 मई से अफगानिस्तान के विभिन्न शहरों में तालिबान ने इतने हमले किए हैं कि जितने उन्होंने पिछले एक साल में भी नहीं किए। पिछले साल फरवरी में तालिबान और अफगानिस्तान की गनी सरकार के बीच जो समझौता हुआ था, वह अब हवा में उड़ गया है। यह समझौता अमेरिका की पहल पर कतर की राजधानी दोहा में हुआ था। इस समझौते के मुताबिक 1 मई 2021 को अफगानिस्तान से सारी विदेशी फौजों को वापस चले जाना था। यह समझौता ट्रंप-प्रशासन ने करवाया था लेकिन बाइडन-प्रशासन ने इसकी तारीख बदल दी। उसने घोषणा की कि 1 मई को नहीं, अब अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान से 11 सितंबर 2021 को वापस लौटेंगी। यह वह दिन है, जिस दिन तालिबान ने अमेरिका पर हमला किया था। तालिबान इस तिथि-परिवर्तन से बेहद नाराज़ हैं। इसे वे अपना अपमान मानते हैं। इसलिए 1 मई के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान में लगातार हमले बोल रखे हैं। बाइडन-प्रशासन ने गनी-सरकार को भरोसा दिलाया है कि 11 सितंबर के बाद भी अमेरिका अफगानिस्तान का ख्याल रखेगा। उसे वह आतंकवादियों के हवाले नहीं होने देगा। इसका तालिबान यही अर्थ निकाल रहे हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में डटा रहेगा। अफगानिस्तान से फौजी वापसी की इच्छा ओबामा और ट्रंप, दोनों प्रशासनों ने व्यक्त की थी और उसके आधार पर अमेरिकी जनता के वोट भी जुटाए थे लेकिन तालिबान को शक है कि अमेरिका अफगानिस्तान में डटे रहना चाहता है। उसका कारण तो यह है कि परमाणु समस्या पर अभी तक दोनों देश, अमेरिका और ईरान उलझे हुए हैं और रुस के साथ भी अमेरिका की तनातनी चली आ रही है। चीन के साथ भी अमेरिका की कूटनीतिक मुठभेड़ तो जग-जाहिर है। ऐसी हालत में अफगानिस्तान में टिके रहना उसे अपने राष्ट्रहित की दृष्टि से जरुरी लग रहा है। उसने वियतनाम को खाली करने का नतीजा देख लिया है। उत्तरी वियतनाम को दक्षिण वियतनाम जीम गया है। यद्यपि अफगानिस्तान बहुत ही गहन राष्ट्रवादी देश है लेकिन पाकिस्तान तालिबान के जरिए वहां अपना वर्चस्व कायम करना चाहेगा। पाकिस्तानी वर्चस्व फिलहाल अफगानिस्तान में रुस और चीन का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह गणित भारतीय विदेश मंत्रालय के दिमाग में भी हो सकता है। इस मौके पर, जबकि तालिबान के लगातार हमले हो रहे हैं, पाक सेनापति और गुप्तचर-प्रमुख की काबुल-यात्रा का अभिप्राय क्या है ? क्या वे तालिबान को चुप कराने के लिए काबुल गए हैं और गनी सरकार का मनोबल बढ़ाने के लिए गए हैं ? यह एक पहेली है। इस मौके पर भारत सरकार का मौन और उदासी अपने आप में एक पहेली है। 

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