ऐसे करें हल्दी की खेती


मई के महीने का आखिरी सप्ताह हल्दी की बुवाई के लिए सही समय होता है। इसकी खेती आसानी से की जा सकती है और आमदनी का अच्छा ज़रिया बन सकती है। हल्दी की खेती में सबसे अच्छी बात होती है कि इसे छाया में भी उगाया जा सकता है।

ऐसे करें हल्दी की खेती


हल्दी एक महत्वपूर्ण मसाले वाली फसल है जिसका उपयोग औषिध से लेकर अनेक कार्यो में किया जाता है। इसके गुणों का जितना भी बखान किया जाए थोड़ा ही है, क्योंकि यह फसल गुणों से परिपूर्ण है। इसकी खेती आसानी से की जा सकती है तथा कम लागत तकनीक को अपनाकर इसे आमदनी का एक अच्छा साधन बनाया जा सकता है।

हल्दी की बुवाई कब करें

मई के महीने का आखिरी सप्ताह हल्दी की बुवाई के लिए सही समय होता है। इसकी खेती आसानी से की जा सकती है और इसकी खेती को अपनाकर आमदनी का अच्छा ज़रिया बनाया जा सकता है। हल्दी की खेती में सबसे अच्छी बात होती है कि इसे छाया में भी उगाया जा सकता है।

हल्दी की बुवाई के लिए भूमि का चयन

हल्दी के लिए उपजाऊ जल निकास युक्त बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। जल निकास की उचित व्यवस्था होना चाहिए। यदि ज़मीन थोड़ी अम्लीय है तो उसमें हल्दी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी खेती बागों के बीच में खाली स्थान में की जा सकती है। पैदावार व गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आती है।

हल्दी की उत्तम प्रजातियां

सी.एल. 326 माइडुकुर:- लीफ स्पाट बीमारी की अवरोधक प्रजाति है ये नौ माह में तैयार होती है। उत्पादन क्षमता 200-300 क्विं./हेक्टेयर।

सी.एल. 327 ठेकुरपेन्ट:- इसके पंजे लम्बे, चिकने एवं चपटे होते हैं। परिपक्वता अवधि 5 माह तथा उत्पादन क्षमता 200-250 क्विं./हेक्टर होती हैं।

कस्तूरी:- यह शीघ्र (7 माह) में तैयार होती हैं। इसके पंजे पतले एवं सुगन्धित होते हैं। उत्पादन 150-200 क्विं./ हेक्टेयर 25 प्रतिशत सूखी हल्दी मिलती हैं।

पीतांबरा:- यह राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित है, यह अधिक उत्पादन देती है। आई.सी.ए.आर. द्वारा स्थापित हाई अल्टीट्यूट अनुसंधान केन्द्र पोटांगी (उड़ीसा) द्वारा उत्पादन की गई प्रजातियां निम्नलिखित हैं जो म.प्र. के लिए उपयुक्त हैं।

रोमा:- यह किस्म 250 दिन में परिपक्व होती हैं। उत्पादन 207 क्विंटल/हेक्टेयर शुष्क हल्दी 31.1 प्रतिशत, ओलियोरोजिन 13.2 प्रतिशत इरोन्सियल आयल 4.4 प्रतिशत सिंचित एवं असिंचित दोनों के लिए उपयुक्त होती हैं।

सूरमा:- इसकी परिपक्वता अवधि 250 दिन एवं उत्पादन 290 क्विं./हे. शुष्क हल्दी 24.8 प्रतिशत, ओलियोरोजीन 13.5 प्रतिशत, इरोन्सियल आयल 4.4 प्रतिशत उपयुक्त होती हैं।

खाद तथा उर्वरक

इसमें गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए क्योंकि गोबर की खाद डालने से ज़मीन अच्छी तरह से भुरभुरी बन जायेगी। इससे जो भी रासायनिक उर्वरक दिया जायेगा, उसका समुचित उपयोग हो सकेगा। इसके बाद 100-120 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस और 80-100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर करना चाहिए।

सिंचाई

हल्दी की फसल में 20-25 हल्की सिंचाई की ज़रूरत पड़ती हैं। गर्मी में 7 दिन के अन्तर पर तथा शीतकाल में 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।

कीट नियंत्रण

आम तौर पर हल्दी में कीड़ो की कोई ज्यादा समस्या नहीं देखी गई है। कहीं- कहीं पर बेधक तथा रस चूसने वाले कीड़ों की समस्या आती है। तना बेधक के लिए फोरेट थीमेट दो में से कोई एक दवा का 10 किलो हेक्टेयर के हिसाब से प्रयोग किया जा सकता है।