प्याज़ की फ़सलों को कैसे बचाएं काले धब्बे से?


महाराष्ट्र राज्य में खरीफ़ मौसम में इस बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। यह रोग कोलेटोट्रायकम ग्लेओस्पोराइडम कवक से होता है।

प्याज़ की फ़सलों को कैसे बचाएं काले धब्बे से?


महाराष्ट्र राज्य में खरीफ़ मौसम में इस बीमारी का प्रकोप अधिक होता है। यह रोग कोलेटोट्रायकम ग्लेओस्पोराइडम कवक से होता है। रोग के प्रारंम्भ में पत्तियों के बाहरी भाग पर ज़मीन से लगने वाले भाग में राख के रंग के चकत्ते बनते हैं। जो बाद में बढ़ जाते हैं तथा सम्पूर्ण पत्तियों पर काले रंग के उभार दिखने लगते हैं।

ये उभार गोलाकार होते हैं। इससे प्रभावित पत्तियाँ मुरझाकर मुड़ जाती है तथा अंत में सूख जाती हैं। लगातार एक के बाद एक पत्तियाँ काली हो जाती हैं और पौधे मर जाते हैं। इन धब्बों को पास से देखें तो इनके बीच वाला भाग सफेद रंग का दिखार्इ देता है तथा इसके आजू बाजू गोलाकार काले कांटेदार चकत्ते दिखते हैं।

खरीफ़ मौसम में नमी वाले वातावरण में इस रोग की शीध्र वृद्धि होती है, और रोगाणु, वर्षा के छीटों द्वारा एक दूसरे से पौधों पर पहुँच जाते हैं। इसी प्रकार यह रोग पौधाशाला से खेतों में भी पहुँचता है। जलभराव, नमीयुक्त वातावरण, रिमझिम वर्षा या आकाश में बादलों से भरे मौसम आदि परिसिथतियों में इस रोग का प्रकोप बढ़ता है। फ़सल की वृद्धि के दौरान इस रोग के प्रकोप से पत्तियाँ सूखने लगती हैं, तथा कन्द नहीं बन पातें हैं।

रोकथाम

रोपार्इ से पूर्व पौधों की जड़ों को कार्बान्डाजिम या क्लोरोथलोनिल के 0.2: धोल में डुबाना चाहिए।
पौधशला के लिए उठी हुर्इ क्यारियाँ बनानी चाहिए।
पौधशाला में बीज पतला बोना चाहिए।
पौधों की आवश्यकतानुसार निरार्इ-गुड़ार्इ करते रहना चाहिए।
खरीफ़ मौसम में अच्छे जलनिकास वाली भूमि में प्याज़ की खेती करनी चाहिए और मेढ़ों पर उठी हुर्इ क्यारियों पर रोपार्इ करनी चाहिए। एक मेढ पर दो पत्तियां (मेड के दोनों ओर) लगाना चाहिए। मेढों के शीर्ष पर एक अतिरिक्त पत्तियां लगानी चाहिए। इससे पौधे घने हो जाते हैं तथा रोग का प्रकोप बढ़ता है।
मेन्कोजेब (डार्इथेन एम-45) 30 ग्राम या कार्बेन्डाजिम
20 ग्राम को 10 लीटर पानी में घोल कर 12 से 15 दिन के अन्तराल पर अदल-बदल कर छिड़काव करना चाहिए।