मशरूम की खेती से किसान बन रहे आत्मनिर्भर


राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ.दयाराम तीन दशकों से बिहार में मशरूम की खेती के लिए जाने जाते है। उनके तीन मंत्र है-मशरूम, उपजाइए, खाइए, बेचिए।

मशरूम की खेती से किसान बन रहे आत्मनिर्भर


राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ.दयाराम तीन दशकों से बिहार में मशरूम की खेती के लिए जाने जाते हैं। उनके तीन मंत्र हैं- मशरूम, उपजाइए, खाइए, बेचिए। पिछड़े इलाके के अभावग्रस्त किसानों को वह तब से मशरूम की खेती और मुनाफे का गणित समझा रहे है, जबसे किसान इससे परिचित भी नहीं थे।

महज़ दो कमरे की झोपड़ी में मशरूम उगाने की विधि समझकर दयाराम ने अभी तक करीब 60 हज़ार से अधिक किसान परिवार की किस्मत बदल दी है। इनसे प्रशिक्षित-प्रोत्साहित कई किसान अपने प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुके हैं।

पूसा एवं आसपास के क्षेत्रों में मशरूम मैन के नाम से विख्यात दयाराम का एक ही मिशन है परंपरागत खेती से पीछा छुड़ाकर किसानों और महिलाओं को नकदी फसल के लिए प्रेरित करना। यूपी के जौनपुर ज़िले के दयाराम ने 1991 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से प्लांट पेथोलोजी में पीएचडी करने के बाद बिहार की राह पकड़ ली थी। माधोपुर के रीजनल रिसर्च सेंटर में कनिये वैज्ञानिक के रूप में सेवा की शुरुआत की। तभी से मशरूम की खेती के लिए जीने मरने लगे।

ख्याति मिली तो वर्ष 2000 में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में अध्यापक की नौकरी मिल गई। यहाँ भी उन्हें मशरूम परियोजना का प्रभारी बनाया गया। अब तक उन्होंने हज़ारों किसानों को आर्थिक गुलामी से मुक्ति दिलाकर आत्मनिर्भर बनाया है। महिलाएं उनकी प्राथमिकता में है।

यही कारण है कि 2013 में उन्हें स्वामी सहजानंद सरस्वती सम्मान से भी नवाज़ा जा चूका है। राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार महिला उत्थान में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। दयाराम की ख्याति अब देश-प्रदेश की सीमा लांघने लगी है। पहली बार मेडागास्कर के किसान ग़ालिब हुसैन पूसा आए हैं। उन्हें दयाराम से मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बनना है। 

Recent Posts

Categories