सरसों और मसूर की फ़सल अब धान के खेत में


अब तक यही देखा जा रहा था कि किसान धान की कटनी करने के बाद खेत की जोताई, हेंगाई आदि कर उसे बीज डालने योग्य बनाते थे।

सरसों और मसूर की फ़सल अब धान के खेत में


अब तक यही देखा जा रहा था कि किसान धान की कटनी करने के बाद खेत की जोताई, हेंगाई आदि कर उसे बीज डालने योग्य बनाते थे। इसमें उन्हें जहां एक ओर ज्यादा समय लगता था, तो दूसरी ओर उपज भी कम होती थी।

लेकिन हाल के कुछ वर्षों में कई किसानों ने ज़ीरो टिलेज तकनीक अपनाकर इस बात को साबित कर दिया है। किसान धान की कटनी कर बिना जुताई कर ज़ीरो टिलेज मशीन का उपयोग कर सरसों, तोरी व मसूर की सीधी बुआई कर सकते हैं। यह विधि देश में दलहन एवं तेलहन की बढ़ती हुई मांग को पूरा करने में कामयाब साबित हो सकती है।

ज़िले में इस विधि को शीशा प्रोजेक्ट ने विकसित किया है। इसकी सफल पहल के बाद कई प्रखंडों के किसानों ने इसे अपना लिया है। इस विधि से धान कटनी के बाद तोरी, सरसों या मसूर में से किसी एक के बीज की बुआई की जा सकती है। बुआई का समय 15 अक्टूबर से 30 अक्टूबर के बीच करने को कहा गया है। इस विधि से खेती करने से एक एकड़ में करीब 2 हज़ार रुपये की बचत होती है और उत्पादन प्रति एकड़ करीब 2 से 3 ¨क्वटल ज्यादा हो जाता है।

विधि की विशेषता के कारण ज़िले के मझौलिया के लाल सरैया, बगहा दो के बिनवलिया, चनपटिया के खोरा, बैरिया के पटजिरवा, रामनगर के भवल तथा मैनाटांड़ के रमपुरवा के किसानों ने पिछले तीन वर्षों से सफ़ल रूप से दलहन व तेलहन की खेती कर रहे हैं। मझौलिया लाल सरैया के सुशील कुमार जायसवाल, बगहा एक के जय नारायण काजी, चनपटिया खोरा के राजू कुमार, बैरिया कोईरपट्टी के मुन्ना कुमार आदि बताते हैं कि उन्हें पारंपरिक विधि की जगह ज़ीरो टीलेज से मसूर, तोरी या सरसों की खेती करने में खर्च कम व लाभ ज्यादा हो रहा है।

इन क्षेत्रों में करीब 200 ए़कड़ में दलहन व तेलहन की खेती ज़ीरो टीलेज विधि से की जा रही है। ज़ीरो टीलेज विधि से खेती करने के पहले किसानों को कृषि विशेषज्ञ से आवश्यक सलाह लेनी चाहिए।

 

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