मूंग की खेती के फ़ायदे


गेहूं की कटाई हो जाने के बाद खाली खेत में किसान अविलंब मूंग की बुआई कर सकते हैं। मूंग की दो तुड़ाई कर खेत की जुताई कर खेत में पानी भरने से इसकी झांगी हरी खाद बन जाती है।

मूंग की खेती के फ़ायदे


गेहूं की कटाई हो जाने के बाद खाली खेत में किसान अविलंब मूंग की बुआई कर सकते हैं। मूंग की दो तुड़ाई कर खेत की जुताई कर खेत में पानी भरने से इसकी झांगी हरी खाद बन जाती है। इस खाद से एक तो खेत की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। दूसरा खरीफ की फसल में रासायनिक उर्वरक की कम मात्रा प्रयुक्त की जाती है। मूंग बहुमुखी दलहन फसल है जिसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है।

कृषि उपनिदेशक डॉ. एके मिश्र के अनुसार 65 से 70 दिनों में पक जाने वाली मूंग की अच्छी प्रजाति के बीज नरेंद्र मूंग-1 इन दिनों जनपद के समस्त राजकीय कृषि बीज भंडारों पर उपलब्ध हैं। यह प्रजाति पीले मौजेक नामक कीट के प्रति सहनशील हैं।

खेत की तैयारी: दोमट या दोमट मटियार ऐसी भूमि जिसकी जल धारण क्षमता अच्छी हो, मूंग के लिए उत्तम है। किसान के पास निजी सिंचाई का साधन होना आवश्यक है। खेत की सिंचाई कर जुताई कर दें। नमी बनी रहने के दौरान ही बोआई करें।

बीज शोधन: बोआई के लिए यह सर्वोत्तम समय है। बेहतर जमाव एवं रोगमुक्त फसल के लिए 2.5 ग्राम थीरम या दो ग्राम थीरम और एक ग्राम कार्बेन्डाजिम अथवा पांच किग्रा ट्राइकोडर्मा से प्रति किग्रा बीज शोधित करें। बीज शोधन के बाद इसे एक बोरे पर फैला दें। आधे लीटर पानी में 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर मिला दें। इस मिश्रण को दस किग्रा बीज पर छिड़क कर हाथ से ऐसे मिलाएं कि बीज के उपर एक पर्त बन जाए। इसे छाए में दो घंटे तक रहने दें। ध्यान रहे कि न तो इसे तेज़ धूप में रखें ना दोपहर में बोआई करें।

उर्वरक: प्रति हेक्टेयर 10-15 किग्रा यूरिया एवं 40 किग्रा फास्फोरस का प्रयोग करें। यह संपूर्ण मात्रा बुआई के दौरान कूंड़ में गिरा दें। फास्फोरस या सुपर फास्फेट न होने पर एक कुंतल डीएपी और दो कुंतल जिप्सम का प्रयोग किया जा सकता है।

सिंचाई: पहली सिंचाई अनिवार्य रूप से बुआई के न्यूनतम तीस दिन बाद करें। जल्दी सिंचाई करने से उकठने की संभावना रहती है। इसके बाद 10-15 दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करें।

विशेष: दो बार फली तोड़ने के बाद खेत की खड़ी फसल की जुताई करें। इसके बाद खेत में पानी डाल दें ताकि इसके अवशेष हरी खाद बन सके।