जानिए गेंदे की खेती और लाभ


गेंदे का पौधा सहिष्णु प्रकृति का होता है। इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में आसानी से कर सकते हैं। अच्छे उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली, बलुई-दोमट मृदा जिसका पी-एच मान 6.5 से 7.5 के मध्य हो, साथ ही उसमें जीवांश पदार्थो की प्रचुर मात्रा हो, अच्छी मानी गयी है।

जानिए गेंदे की खेती और लाभ


गेंदे का पौधा सहिष्णु प्रकृति का होता है। इसकी खेती लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में आसानी से कर सकते हैं। अच्छे उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली, बलुई-दोमट मृदा जिसका पी-एच मान 6.5 से 7.5 के मध्य हो, साथ ही उसमें जीवांश पदार्थो की प्रचुर मात्रा हो, अच्छी मानी गयी है।

जीनस टैजेटिस की लगभग 33 प्रजातियां हैं जिनमें से दो व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं-अफ्रीकी गेंदा और टेजेटिस पेटुला एल. फ्रेंच गेंदा। एक अन्य स्पीसीज टैजेटिस माइन्यूटा, जिसे जंगली गेंदा के नाम से भी जाना जाता है।

अफ्रीका गेंदा (टैजेटिस इरेक्टा) : यह एक वार्षिक पौधा है। इसकी ऊंचाई एक या एक से अधिक मीटर तक हो जाती है और पौधा सीधा एवं शाखाओं वाला होता है. फूल बड़े आकार (7-10सें.मी.) वाले, पीले एवं नारंगी रंगों की विभिन्न छाया में अर्थात् हल्का पीला, सनुहरा पीला, चमकदार पीला, सुनहरा नारंगी, कैडमियम नारंगी, उज्ज्वल नारंगी, या गहरे नारंगी रेगों में होते हैं। 

फ्रेंच गेंदा (टेजेटिस पेटुला) : यह तुलनात्मक रूप से बौना, 20 से 60 से.मी. ऊंचाई वाला वार्षिक पौधा है, जिस पर छोटे आकार (3-5 सें.मी.) के लेमन पीले, सुनहरे पीले, या नारंगी रंग के लाल फूल होते हैं। इस प्रजाति में द्विगुणित गुणसुत्रों की संख्या 48 होती है। इसकी प्रमुख किस्में हैं - पूसा अर्पिता, पूसा दीप, हिसार ब्यूटी, हिसार जाफरी - 2, रस्टी रेड, रेड बोकार्डो, फ्लैश, बटर स्कॉच, वालेंसिया, सुकाना इत्यादि।

जंगली गेंदा (टेजेटिस माइन्यूटा) : यह प्रजाति हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भी उगायी जा रही है। इसका पौधा सीधा 1 से 2 मीटर लम्बा तथा शाखाओं से युक्त होता है। खेती की जाने वाली सभी प्रजातियों में टैजैटिस माइन्यूटा उच्च गुणवत्तायुक्त एवं अधिक तेलयुक्त होता है।

पौध प्रवर्धन के लिये आसान तरीका गेंदे का प्रसारण बीज एवं कलम (कटिंग) विधियों द्वारा असानी से किया जा सकता है। बीज द्वारा तैयार किये गये पौधे ज्यादा अच्छे एवं उपज देने वाले होते है। 

गेंदा की पौध तैयार करने का सहा समय स्थानीय जलवायु एवं उगायी जाने वाली किस्म पर निर्भर करता है। उत्तरी भारत में गेंदा की रोपाई वर्ष के तीनों मौसमों (सर्दी गर्मी एवं वर्षा ) में की जा सकती है। ध्यान रखें किस्म का चुनाव मौसम के अनुरूप ही किया गया हो। उत्तरी भारत के मैदानी भागों में गेंदा अधिकत्तर सर्दियां में ही उगाया जाता है एवं इसी मौसम में अधिकत्तर किस्मों का प्रदर्शन बेहतर रहता है, परन्तु इसकी मांग के अनुसार इसे आसानी से अन्य मौसमों में भी उगाया जा सकता है।

ऐसे करें खेत की तैयारी-

पौध रोपाई के कार्य से पूर्व ही खेत की तैयारी पर भी ध्यान देना प्रांरभ कर दे, क्योंकि जब खेत भलीभांति तैयार होगा तभी कुछ उपज दे पायेगा। इसलिए एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके दो-तीन जुताई देशी हल से कर दें एवं मिटटी को अच्छी तरह से भुरभरा बना लें. इसके साथ ही खेत की तैयारी करते समय संतुंलित मात्रा में खाद एवं उर्वरक भी डालें।

अधिक फूल लेने के लिए ज़रूरी है पिचिंग

अफ्रीकाकन गेंदा में पिंचिंग (शीर्षनोचन),अग्रस्थ प्रभाव को कम करने के लिये किया जाता है। शीर्ष प्रभुता के कारण पौधे लम्बे एवं पतले हो जाते हैं जिन पर काफी कम संख्या में शाखायें निकलती हैं। इसके परिणामस्वरूप फूलों की संख्या में बहुत कमी देखने को मिलती है। पौधे के फैलाव को बढ़ाने के लिए शीर्षनोचन किया जाना आवश्यक है। इस प्रक्रिया में गेंदे के शीर्ष भाग (2-3 से.मी.) को हाथ से तोड़ दिया जाता है, ताकि पौधे में बगल वाली शाखायें अधिक संख्या में निकलें। 

गेंदे की विशेषताएं

अन्य फसलों की तुलना में गेंदे की कुछ खास विशेषताएं हैं जैसे विभिन्न प्रकार की मृदाओं एवं जलवायु में सफलतापूर्वक उगने, पुष्पन की आर्थिक अवधि, पुष्प जीवनकाल अधिक होने के साथ - साथ इसमें कीट एवं बीमारियों का प्रकोप भी कम होने के कारण यह काफी फायदेमंद फसल हैं। 

साथ ही गेंदे के फूल तथा पत्तियों का उपयोग विभिन्न दवाइंयो, तेल निष्कर्षण, आहार योग्य रंगो के उत्पादन में भी किया जाता है. नांरगी फूल वाली किस्मों के फूलां की पंखुड़ियों में कैरोटिनॉइडस-पीला वर्णक (ल्यूटिन) अधिकत्ता में पाया जाता है. इसका उपयोग पोल्ट्री उद्योग में मुर्गियों के दाने के रूप में किया जाता है जिससे अंडे की जर्दी योक का रंग पीला हो जाता है। इसकी जड़ो से अल्फा -टेरथिएनील नामक एक पदार्थ का निर्माण होता है जो मूल ग्रंथ सूत्रकृमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

सही तरीके से करें फूलों की पैकिंग

फूलों को तुड़ाई के पश्चात हमेशा ठंडे स्थान पर ही रखें. गेंदे के फूलों को स्थानीय बाजार में भेजने के लिए टाट के बोरो में पैक किया जाता है और दूर के बाजार के लिए बांस की टोकरी का उपयोग किया जाता है। बता दें गेंदे का पौधा बड़ा सहनशील होता है, जिस पर कीट एवं बीमारियों का आक्रमण काफी कम होता है।