पितृ दोष निवारण के उपाय


अगर पितृ आपके कार्यों से सुखी व संतुष्ट हैं तो आपको इसका विशेष फ़ल मिलता है। आप जिस कार्य को शुरू करते हैं उसी में फ़ायदा होता है। अगर किसी की अकाल मृत्यु हो जाए और मौत के समय यदि कोई इच्छा बाकी रह जाती है तो मृतक पितृ योनि को प्राप्त होता है।

पितृ दोष निवारण के उपाय


अगर पितृ आपके कार्यों से सुखी व संतुष्ट हैं तो आपको इसका विशेष फ़ल मिलता है। आप जिस कार्य को शुरू करते हैं उसी में फ़ायदा होता है। अगर किसी की अकाल मृत्यु हो जाए और मौत के समय यदि कोई इच्छा बाकी रह जाती है तो मृतक पितृ योनि को प्राप्त होता है।

वह इस योनि में तब तक भटकता रहता है जब तक उसकी इच्छा पूरी नहीं कर दी जाती। वह भटकती आत्मा परिवार वालों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए विभिन्न प्रकार से परेशान करना शुरू कर देती है। पितृ दोष निवारण के बाद आत्मा शांत हो जाती है।

ये हैं पितृ दोष निवारण के उपाय-

1. यदि मृत्युतिथि न मालूम हो तो श्राद्ध पक्ष की अमावस्या के दिन तर्पण व पिंडदाना आदि कर्म करें।

2. श्राद्ध पक्ष में मृत्यु तिथि के दिन तर्पण व पिंडदान करें। ब्राह्मण को भोजन कराएं व वस्त्र/दक्षिणा आदि दें।

3. सूर्योदय के समय सूर्य को जल दें और गायत्री मंत्र का जप करें।

4. प्रत्येक अमावस्या विशेषकर सोमवती अमावस्या को पितृभोग दें। इस दिन गोबर के कंडे जलाकर उसपर खीर की आहुति दें। जल के छींटे देकर हाथ जोड़ें और पितृ को नमस्कार करें।

5. रविवार के दिन गाय को गुड़ या गेहूं खिलाएं।

6. पीपल के पेड़ पर जल, पुष्प, दूध, गंगाजल और काले तिल चढ़ाकर पितृ को याद करें, माफी और आशीष मांगें।

7. हरिवंश पुराण का श्रवण और गायत्री जप पितृ शांति के लिए लोकप्रसिद्ध है।

8. पितृ गायत्री का अनुष्ठान करवाएं।

9. नारायणबलि पूजा करवाएं।

10. गया या त्र्यंबकेश्वर में त्रिपिंडी श्राद्ध या नन्दी श्राद्ध करें।

11. पितृ दोष निवारण उपायों में गया में पिंडदान, गया श्राद्ध तथा पितृ भोग अर्पण आदि क्रियाएं करते हुए उपरोक्त पितृ गायत्री मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

12. लाल किताब के अनुसार परिवार में जहां तक खून का रिश्ता है जैसे दादा, दादी, माता, पिता, चाचा, ताया, बहन, बेटी, बुआ, भाई सबसे बराबर-बराबर धन, 1, 5 या दस रुपए लेकर मंदिर में दान करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।

13. पितृ कर्म हेतु साल में 12 मृत्यु तिथि, 12 अमावस्या, 12 पूर्णिमा, 12 संक्रांति, 12 वैधृति योग, 24 एकादशी व श्राद्ध के 15 दिन मिलाकर कुल 99 दिन होते हैं।

 

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