एक कौरव जो बचा था जीवित


शायद आप ये नहीं जानते होगें की कौरव 101 भाई थे। धृतराष्ट्र का एक और भी बेटा था। कौरव और पांडव के बीच लड़े गये युद्ध में वो सत्य का साथ देते हुए पांडवों की तरफ़ से युद्ध लड़े।

एक कौरव जो बचा था जीवित


कुरुक्षेत्र में हुआ एक ऐसा युद्ध जिसे धर्म युद्ध के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में बहुत सारी कहानियां भी हैं। पर शायद आप ये नहीं जानते होंगे की कौरव 101 भाई थे। धृतराष्ट्र का एक और भी बेटा था। जिसका नाम युयुत्सु था, जो एक दासी की कोख से पैदा हुआ था।

यह कहानी तब की है जब गांधारी गर्भवती थीं और दो सालों तक उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ था। उस दौरान वो धृतराष्ट्र की सेवा नहीं कर पाती थीं। तब धृतराष्ट्र की सेवा के लिए एक दासी को रखा गया था। जिसका नाम सुगन्धा था। सुगन्धा और धृतराष्ट्र से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम युयुत्सु रखा गया। युयुत्सु, दुर्योधन से छोटा था परंतु बाकी 99 कौरवों से बड़ा था। राजकुमारों की तरह ही उसकी भी शिक्षा-दीक्षा हुई और वह काफी योग्य सिद्ध हुआ। वह एक धर्मात्मा था, इसलिए दुर्योधन की अनुचित चेष्टाओं को बिल्कुल पसन्द नहीं करता था और उनका विरोध भी करता था। इस कारण दुर्योधन और उसके अन्य भाई उसको महत्व नहीं देते थे और उसका मज़ाक भी उड़ाते थे।

कौरव और पांडव के बीच लड़े गये युद्ध मे युयुत्सु नासत्य का साथ देते हुए पांडवों की तरफ़ से युद्ध लड़ा। महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से पूर्व धर्मराज युद्धिष्ठिर ने आह्वान किया और कहा जो हमारे साथ हैं उनका स्वागत है और जो मेरे खिलाफ़ हैं वो जा सकते हैं। जिस पर युयुत्सु ने कौरवों की सेना का साथ छोड़कर पाण्डव सेना के साथ मिलने का निर्णय लिया था। महाभारत युद्ध में युयुत्सु ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। युधिष्ठिर ने उसको सीधे युद्ध के मैदान में नहीं उतारा, बल्कि उसकी योग्यता को देखते हुए उसे योद्धाओं के लिए हथियारों और रसद की आपूर्ति व्यवस्था का प्रबंध देखने के लिए नियुक्त किया।

उसने अपने इस दायित्व को बहुत ज़िम्मेदारी के साथ निभाया और अभावों के बावजूद पांडव पक्ष को हथियारों और रसद की कमी नहीं होने दी। युद्ध के बाद भी उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। महाराज युधिष्ठिर ने उसे अपना मंत्री बनाया। धृतराष्ट्र के लिए जो भूमिका विदुर ने निभाई थी, लगभग वही भूमिका युधिष्ठिर के लिए युयुत्सु ने निभाई। इतना ही नहीं, जब युधिष्ठिर महाप्रयाण करने लगे और उन्होंने परीक्षित को राजा बनाया, तो युयुत्सु को उसका संरक्षक बना दिया। युयुत्सु ने इस दायित्व को भी अपने जीवने के अंतिम क्षण तक पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निभाया।

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