जानिए जल प्रबंधन में कैसे निहित है किसानों की स्थाई बृद्धि


नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक विश्व भर में भूमिगत जल सबसे अधिक उत्तर भारत से गायब हो रहा है और दिल्ली इस समस्या का केन्द्र है। वहीं आकलनों के अनुसार जल के अभाव के कारण वर्ष 2030 तक जीडीपी में 6 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है।

जानिए जल प्रबंधन में कैसे निहित है किसानों की स्थाई बृद्धि


नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक विश्व भर में भूमिगत जल सबसे अधिक उत्तर भारत से गायब हो रहा है और दिल्ली इस समस्या का केन्द्र है। वहीं आकलनों के अनुसार जल के अभाव के कारण वर्ष 2030 तक जीडीपी में 6 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है।

किसानों पर प्रभाव

बता दें बढ़ता जल संकट कृषि के लिये गंभीर चुनौती है, जल बर्बाद होने के कारण किसानों को बड़ा नुकसान हो रहा है, उनकी उत्पादन लागत बढ़ रही है और सूखा-प्रवण क्षेत्रों में उन्हें भारी गरीबी का सामना करना पड़ रहा है. कृषि उत्पादन के मामले में भारत विश्व में दूसरे नंबर पर आता है और देश के जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 17 प्रतिशत है. फिर भी अधिकांश राज्यों में सिंचाई की व्यवस्था सदियों पुरानी है. हम माॅनसून पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हैं और वर्षाजल संरक्षण के प्रयास बहुत कम हैं.

वहीं सिंचाई की अवसंरचना में नलिका नेटवर्क, भूमिगत जल, कुंए, टैंक और कृषि गतिविधियों के लिये वर्षा जल संचय एवम अन्य उत्पाद शामिल हैं. विगत वर्षों में इनका विस्तार हुआ है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। साथ ही देश में उपलब्ध ताजे जल का लगभग 78 प्रतिशत कृषि के काम आता है. फसलों को जल का आवंटन असमान आधार पर होता है, 60 प्रतिशत से अधिक जल गन्ने और धान की खेती में लगता है, जो चिंता का विषय है. इन दोनों फसलों को सबसे अधिक मात्रा में जल चाहिये और इनकी व्यापक खेती देश में जल के अभाव वाले क्षेत्रों में भी होती है. इनकी खेती अधिक जल वाले क्षेत्रों में होनी चाहिये।

आपको बता दें भूमिगत जल कम होने का तात्पर्य पम्पिंग की लागत, लवण की मात्रा, भारी धातुओं की मौजूदगी, आदि बढ़ने और फसल उत्पादन की लागत और उत्पाद की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा होने से है. इसकी समीक्षा की जानी चाहिये और विकल्पों पर काम होना चाहिये. इसके अलावा, लंबे समय से जल के अभाव में रहे क्षेत्रों को विशेषीकृत समाधान चाहिये, जहाँ सामान्य कार्यवाही प्रभावी नहीं हो सकती है।

इसके साथ ही जल संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिये जमीनी स्तर पर मजबूत जल अवसंरचना बनाने में निजी कंपनियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) माॅडल कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है। अभी निजी कंपनियों की अधिक संलग्नता चाहिये, उन्हें ग्रामीण/कृषि क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिये समाधान विकसित करने चाहिये। बता दें उदाहरण के लिये, एक अग्रणी एग्रोकेमिकल कंपनी धानुका एग्रीटेक विगत एक दशक से ग्रामीण समुदायों के साथ अपने कार्य में जल संरक्षण को प्राथमिकता दे रही है. कंपनी ने राजस्थान के दो जिलों में वर्षा जल वाले पाँच चेक डैम्स बनाए हैं, जिनसे इस क्षेत्र के लगभग 3000 परिवारों को लाभ हुआ है. छठा चेक डैम निर्माणाधीन है।