आखिर, आ ही गया लोकपाल


सत्ता की राजनीति में उलझे हुए नेता भला लोकपाल की स्थापना क्यों होने देते।

आखिर, आ ही गया लोकपाल


आखिर लोकपाल की नियुक्ति हो ही गई। इस आंदोलन की शुरुआत अब से लगभग पचास साल पहले सांसद डाॅ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी और डाॅ. सुभाष काश्यप ने की थी और फिर यही आंदोलन दस साल पहले अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे ने चलाया था। जरा गौर करें कि इस आंदोलन को चलानेवाले लोग कभी सत्तारुढ़ नेता नहीं रहे। वे मूलतः समाज सुधारक रहे हैं। सत्ता की राजनीति में उलझे हुए नेता भला लोकपाल की स्थापना क्यों होने देते। आज के जमाने में भ्रष्टाचार किए बिना कोई प्रधानमंत्री तो क्या, पार्षद भी नहीं बन सकता। नरेंद्र मोदी सरकार ने भी पांच साल तक लोकपाल की नियुक्ति को उसी तरह झुलाए रखा जैसे अन्य दलों की सरकारें झुलाती रहीं।

अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपना डंडा चलाया तो उसे झक मारकर लोकपाल नियुक्त करना पड़ा। इस नियुक्ति में भी कांग्रेस ने असहयोग किया। उसके नेता इसलिए चयन समिति की बैठक में नहीं गए कि उन्हें ‘विशेष आमांत्रित’ के तौर पर बुलाया गया था, क्योंकि कांग्रेस को लोकसभा में ‘विपक्ष’ की मान्यता नहीं है। इसका अर्थ यह भी हुआ कि देश के इस प्रथम लोकपाल को भी राजनीति में घसीटा जाएगा। कहा जाएगा कि यह भाजपा का लोकपाल है। जो भी हो, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज पीसी घोष से देश आशा करेगा कि वे अपना काम पूरी निष्पक्षता और निडरता से करेंगे।

आठ सदस्यीय लोकपाल मंडल नियुक्त हो जाने पर उसे अपने काम से यह सिद्ध करना होगा कि प्रधानमंत्री से लेकर निचले सरकारी अधिकारी तक के भ्रष्टाचार की वह कलई खोलने में कोई लिहाजदारी नहीं करेगा। वह सीबीआई की तरह पिंजरे का तोता सिद्ध नहीं होगा। उसे सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग से भी ज्यादा सख्त होना होगा। मोदी सरकार को बधाई कि उसके हाथों यह महान संस्था कायम हुई। स्वीडन में ‘ओम्बड्समेन’ के नाम से यह संस्था पिछले 300 साल से काम कर रही है। इसने स्वीडन और नार्वे के अलावा कई यूरोपीय राष्ट्रों में सार्थक काम करके दिखाया है। आशा की जाए कि भारत का लोकपाल हमारे पड़ौसी देशों के लिए भी आदर्श और प्रेरणा का काम करेगा।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

 

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