गोगोईः ईगो और लिबिडो


प्रसिद्ध स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था कि आदमी का ‘ईगो’ (अहंकार) और ‘लिबिडो’ (यौन-वासना) दोनों साथ-साथ चलते हैं।

गोगोईः ईगो और लिबिडो


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रसिद्ध स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जुंग ने अपनी एक पुस्तक में लिखा था कि आदमी का ‘ईगो’ (अहंकार) और ‘लिबिडो’ (यौन-वासना) दोनों साथ-साथ चलते हैं। यह तथ्य है और सही है। कई लोग इतनी आध्यात्मिक और मानसिक ऊर्जा इकट्ठी कर लेते हैं कि वे इन दोनों मानवीय दुर्बलताओं पर नियंत्रण कर लेते हैं। लेकिन यदि हम मनुष्य जाति के इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता चलता है कि दुनिया के ताकतवर लोग याने बड़े-बड़े साधु-संत, पोप-पादरी, राजा-महाराजा, धन्ना सेठ और शीर्ष नेतागण अपनी यौन-वासना को तृप्त करने के लिए कई-कई पत्नियां और रखेंले रखते हैं। उनकी प्रेमिकाओं और वेश्याओं की भी भरमार होती है। आज भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को भी इसी श्रेणी में खींच लाने की कोशिश की गई है। एक 35 वर्षीय महिला ने एफआईआर दर्ज करवाकर गोगोई के खिलाफ यौन-प्रताड़ना का आरोप लगाया है। मैंने उस एफआईआर को लगभग पूरा पढ़ा है। अखबारों ने उसे नहीं छापा है लेकिन कई वेबसाइटस पर वह प्रचारित हुई है। मुझे यह समझ में नहीं आया कि उस महिला ने 10-11 अक्तूबर 2018 में हुई यौन-प्रताड़ना पर तत्काल तगड़ा विरोध क्यों नहीं किया ? वह छह माह तक इंतजार क्यों करती रही ? उसने यही समय क्यों चुना ? उसे सर्वोच्च न्यायालय से तबादला करके गोगोई के घर के दफ्तर में नियुक्त किया गया, उसकी योग्यता से ऊंचा काम उसे सौंपा गया और उसे वहां देर तक रुकने के लिए कहा जाता रहा तो भी उसे गोगोई के इरादों पर शक क्यों नहीं हुआ ? गोगोई की मीठी-मीठी और व्यक्तिगत बातों को वह बर्दाश्त क्यों करती रही ? अपने पति और देवर को नौकरी दिलाने के लिए उसने यौन-अत्याचार के आगे समर्पण क्यों किया ? उसके अनुसार गोगोई ने उसे जब सब बातें गोपनीय रखने के लिए कहा और उस पर अत्याचार बढ़ने लगे तो उसने मुंह खोला। तब उसे निकाल दिया गया और रिश्वत के मामले में फंसाकर गिरफ्तार भी करवा दिया गया। इसका अर्थ यह नहीं कि गोगोई सर्वथा निर्दोष होंगे। गोगोई के इस तर्क में कोई दम दिखाई नहीं देता कि न्यायपालिका की आजादी खतरे में है और (कुछ नेताओं ने) उन्हें ब्लेकमेल करने के लिए यह नाटक रचाया है। कोई पढ़ी-लिखी महिला नेताओं के खातिर अपने आप को सूली पर क्यों चढ़वाएगी ? गोगोई का यह कथन सही हो सकता है कि वे बेहद ईमानदार और निष्पक्ष न्यायाधीश हैं लेकिन अर्थशुचिता का मतलब यौन-शुचिता नहीं है। यौनाचार करते हुए कई पोप और संत-महंत पकड़े गए हैं। यह मानवीय कमजोरी है। गोगोई के खिलाफ बलात्कार की शिकायत नहीं है। सिर्फ यौनाचार की है। यदि किसी कमजोर वक्त में उनसे ऐसा हुआ है तो उन्हें उस महिला से क्षमा मांगना चाहिए और इस मामले को यहीं खत्म कर देना चाहिए। यह मामला ऐसा है, जिसे सिद्ध या असिद्ध ठहराने के लिए पर्याप्त प्रमाण न तो गोगोई के पास होंगे और न ही उस महिला के पास !