महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर ठाकरे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। करीब बीस वर्षों तक राजनीतिक और पारिवारिक दूरी बनाए रखने के बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का साथ आना केवल भावनात्मक घटना नहीं, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक संकेत भी हैं। खासतौर पर मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों से पहले यह मेल-जोल सियासी समीकरणों को नई दिशा दे सकता है।
रिश्तों की बर्फ कैसे पिघली
ठाकरे भाइयों के बीच बढ़ती नजदीकी की शुरुआत जुलाई 2025 में मराठी भाषा और अस्मिता से जुड़े एक आयोजन से हुई, जहां दोनों पहली बार लंबे समय बाद एक मंच पर दिखे। इसके बाद व्यक्तिगत मुलाकातों का सिलसिला तेज हुआ। राज ठाकरे का उद्धव ठाकरे के जन्मदिन पर ‘मातोश्री’ पहुंचना और गणेशोत्सव के दौरान उद्धव ठाकरे का पूरे परिवार के साथ राज ठाकरे के निवास ‘शिवतीर्थ’ जाना, इन रिश्तों में आए बदलाव के स्पष्ट संकेत थे।
आने वाले महीनों में पारिवारिक समारोहों, सामाजिक आयोजनों और यहां तक कि चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़ी बैठकों में भी दोनों की संयुक्त मौजूदगी देखी गई। नवंबर में मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर साझा आंदोलन की घोषणा और दिसंबर में परिवार की शादी में पूरे ठाकरे परिवार का एक साथ नजर आना, यह दर्शाता है कि यह नजदीकी अब केवल निजी स्तर तक सीमित नहीं रही।
एमएनएस का उतार-चढ़ाव भरा सफर
राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना की थी। शुरुआती वर्षों में पार्टी ने प्रभाव छोड़ा और 2009 के विधानसभा तथा 2012 के बीएमसी चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन इसके बाद पार्टी का जनाधार धीरे-धीरे कमजोर होता गया। विधानसभा और नगर निकाय चुनावों में सीटों की संख्या घटती चली गई और हालिया चुनावों में पार्टी को बड़ा झटका लगा।
इसके बावजूद राज ठाकरे की आक्रामक शैली, मराठी मुद्दों पर मुखर रुख और उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता ने एमएनएस को पूरी तरह राजनीतिक हाशिये पर जाने से रोके रखा। अक्सर विरोधी दलों ने पार्टी को ‘वोट काटने वाली ताकत’ के रूप में देखा।
मुंबई का सियासी गणित और नई चुनौती
मुंबई की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मराठी मतदाता, जिन्हें पारंपरिक रूप से ठाकरे परिवार का समर्थक माना जाता है, शहर की आबादी का बड़ा हिस्सा हैं। इसके साथ ही मुस्लिम और दलित वोटों का रुझान भी सत्ता संतुलन तय करने में अहम रहता है।
पिछले चुनावी आंकड़े बताते हैं कि कई वार्डों में एमएनएस को मिले वोट जीत और हार के अंतर से अधिक थे। यानी भले ही पार्टी सीटें न जीत पाई हो, लेकिन उसका प्रभाव पूरे शहर में महसूस किया गया। यही कारण है कि ठाकरे भाइयों का एक मंच पर आना खासतौर पर भाजपा और सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।
एकजुटता के राजनीतिक मायने
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के बीच औपचारिक तालमेल मजबूत होता है, तो मराठी वोटों का बड़ा हिस्सा एकजुट हो सकता है। इससे मुंबई और अन्य शहरी क्षेत्रों में विपक्ष को नई ताकत मिल सकती है। मराठी अस्मिता, भाषा और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर की जाने वाली साझा राजनीति भाजपा के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है।
आगे की राह
दिसंबर 2025 में दोनों दलों द्वारा गठबंधन की औपचारिक घोषणा के बाद यह साफ हो गया है कि ठाकरे भाई आने वाले चुनावों में साथ उतरने की तैयारी में हैं। उद्धव ठाकरे जहां खुद को भाजपा के खिलाफ प्रमुख विपक्षी नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, वहीं राज ठाकरे के लिए यह गठबंधन अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा मजबूत करने का अवसर हो सकता है।
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आने वाले स्थानीय निकाय चुनाव इस नई सियासी दोस्ती की पहली बड़ी परीक्षा होंगे। ठाकरे भाइयों की यह एकजुटता महाराष्ट्र की राजनीति में क्या बड़ा बदलाव लाएगी, इस पर अब सबकी नजर टिकी है।









