असम की राजनीति में एक बार फिर रणनीतिक फैसलों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता गौरव गोगोई के खिलाफ जोरहाट से चुनाव लड़ने का जोखिम क्यों नहीं उठाया।
कांग्रेस से बीजेपी तक का सफर
हिमंता बिस्वा सरमा का राजनीतिक करियर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वे कभी पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार में एक प्रभावशाली मंत्री थे। 2013 में मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखने के बावजूद जब कांग्रेस ने उन्हें मौका नहीं दिया, तो उन्होंने 2016 में पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया।
बीजेपी में आने के बाद उन्होंने सर्बानंद सोनोवाल सरकार में मंत्री के रूप में काम किया और 2021 में पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी—जो बीजेपी की परंपरा के लिहाज से एक असामान्य फैसला माना जाता है।
चुनावी चुनौती और बदली रणनीति
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान हिमंता सरमा ने गौरव गोगोई को जोरहाट से चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी, जिसे गोगोई ने स्वीकार कर जीत भी हासिल की। ऐसे में अगर सरमा विधानसभा चुनाव में उसी सीट से मैदान में उतरते, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से काफी समय और संसाधन लगाने पड़ते।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पूरे राज्य में चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी निभा रहे मुख्यमंत्री के लिए किसी एक सीट पर फोकस करना रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता था।
हार का जोखिम भी बड़ा कारण
इस फैसले के पीछे एक अहम वजह संभावित राजनीतिक जोखिम भी माना जा रहा है। यदि हिमंता सरमा जोरहाट से चुनाव हार जाते, तो भले ही बीजेपी राज्य में सरकार बना लेती, उनके मुख्यमंत्री बने रहने पर सवाल खड़े हो सकते थे। ऐसी स्थिति में पार्टी अपने संगठन से जुड़े किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री पद के लिए चुन सकती थी।
सामाजिक समीकरण भी अहम
जोरहाट और ऊपरी असम क्षेत्र में सामाजिक समीकरण भी इस फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गौरव गोगोई अहोम समुदाय से आते हैं, जो इस क्षेत्र में प्रभावशाली माना जाता है। ऐसे में यदि हिमंता सरमा वहां से चुनाव लड़ते, तो समुदाय के भीतर एकजुटता गोगोई के पक्ष में जा सकती थी, जिससे बीजेपी को नुकसान होने की आशंका थी।
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व्यापक रणनीति पर फोकस
इन सभी कारणों को देखते हुए हिमंता बिस्वा सरमा ने व्यक्तिगत मुकाबले के बजाय पूरे राज्य की चुनावी रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना ज्यादा उचित समझा। यह फैसला दर्शाता है कि बीजेपी इस बार असम में केवल सीट जीतने के बजाय व्यापक राजनीतिक संतुलन और नेतृत्व को बनाए रखने पर जोर दे रही है।








