राजस्थान के राजसमंद जिले की पिपलांत्री पंचायत की पर्यावरण और सामाजिक पहल को राष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ी पहचान मिली है। पिपलांत्री की कहानी पर आधारित डॉक्यूमेंट्री ‘पिपलांत्री: ए टेल ऑफ इको फेमिनिज्म’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में ‘सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सर्वश्रेष्ठ नॉन-फीचर फिल्म’ की श्रेणी में रजत कमल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इस खास मौके पर पिपलांत्री ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच और पद्म श्री से सम्मानित श्याम सुंदर पालीवाल भी डॉक्यूमेंट्री की प्रोडक्शन टीम के साथ समारोह में मौजूद रहे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रदान किए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 22 सितंबर 2026 को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किए। गुजरात के एकता नगर (केवड़िया) में आयोजित समारोह में विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट फिल्मों और फिल्म कलाकारों को सम्मानित किया गया।
इसी समारोह में पिपलांत्री की सामाजिक और पर्यावरणीय पहल को पर्दे पर प्रस्तुत करने वाली डॉक्यूमेंट्री को रजत कमल पुरस्कार दिया गया।
बेटी के जन्म पर लगाए जाते हैं 111 पेड़
‘पिपलांत्री: ए टेल ऑफ इको फेमिनिज्म’ डॉक्यूमेंट्री पिपलांत्री ग्राम पंचायत की उस पहल को केंद्र में रखती है, जिसने बेटी के जन्म और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया है।
पिपलांत्री में प्रत्येक बालिका के जन्म पर 111 पेड़ लगाने की परंपरा विकसित की गई है। इसका उद्देश्य बेटियों के प्रति सकारात्मक सामाजिक सोच को बढ़ावा देने के साथ-साथ हरित क्षेत्र को बढ़ाना और पर्यावरण संरक्षण में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
हिंदी, राजस्थानी और अंग्रेजी में बनी डॉक्यूमेंट्री
यह डॉक्यूमेंट्री हिंदी, राजस्थानी और अंग्रेजी भाषाओं में तैयार की गई है। फिल्म के माध्यम से पिपलांत्री में हुए सामाजिक और पर्यावरणीय बदलाव तथा इसके पीछे स्थानीय लोगों की भागीदारी को सामने लाया गया है।
फिल्म यह भी दिखाती है कि किस तरह किसी ग्राम पंचायत स्तर की पहल को स्थानीय समुदाय के सहयोग और निरंतर प्रयासों के जरिए व्यापक सामाजिक संदेश में बदला जा सकता है।
ग्राम पंचायत से राष्ट्रीय मंच तक पहुंची पिपलांत्री की कहानी
पिपलांत्री की पहल लंबे समय से बेटी के सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ने वाली मिसाल के रूप में चर्चा में रही है। अब इस पहल पर बनी डॉक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने से इसकी कहानी को देश के प्रतिष्ठित फिल्म मंच पर भी पहचान मिली है।
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इस सम्मान ने यह भी रेखांकित किया है कि ग्राम पंचायत स्तर पर शुरू हुई स्थानीय पहलें भी सामाजिक और पर्यावरणीय बदलाव की प्रभावी कहानियां बन सकती हैं।








