क्या आप हैं इरिटेबल बॉएल सिंड्रोम के शिकार?


आईबीएस के रोग में मरीजों की आंत की बनावट में कोई बदलाव नही होता है, इसलिए कई बार इसे सिर्फ रोगी का वहम ही मान लिया जाता है। पर आँतों की बनावट में कोई बदलाव ना आने के बावजूद भी रोगी को कब्ज या बार-बार दस्त लगना, पेट में दर्द, गैस जैसी समस्याएं होती हैं। वहीं गुड़गाँव के वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ० मनोज गुप्ता ने आईबीएस के बारे में पूरी जानकारी देते हैं।

क्या आप हैं इरिटेबल बॉएल सिंड्रोम के शिकार?


आईबीएस के रोग में मरीजों की आंत की बनावट में कोई बदलाव नही होता है, इसलिए कई बार इसे सिर्फ रोगी का वहम ही मान लिया जाता है। पर आँतों की बनावट में कोई बदलाव ना आने के बावजूद भी रोगी को कब्ज या बार-बार दस्त लगना, पेट में दर्द, गैस जैसी समस्याएं होती हैं। वहीं गुड़गाँव के वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ० मनोज गुप्ता ने आईबीएस के बारे में पूरी जानकारी देते हैं।

बता दें, इरिटेबल बॉएल सिंड्रोम रोगियों की शिकायतें अधिकतर रोगी डॉक्टर के पास निम्नलिखित शिकायतें लेकर आते हैं। फिर जब भी चाय, दूध जैसा drink लेता हूँ तो शौच के लिए जाने की जरूरत महसूस होती है। पहली बार में पेट साफ नहीं होता है इससे बार बार टॉयलेट जाना पड़ता है। वहीं बता दें बहुत से रोगियों को दिन में 7 या 8 बार या ज्यादा बार भी शौच के लिए जाना पड़ता है। जबकि कई बार अपने आप ही कब्ज हो जाता है। पेट में दर्द होना या एँठन। बहुत ज्यादा गैस बनना। पेट फूलना मल के साथ चिकना कफ जैसा आना।

आपको बता दें, आईबीएस का कोई एक कारण नही माना गया है। बल्कि कई कारण मिलकर इस रोग के होने का कारण बनते हैं।

 विशेष खाद्य पदार्थों के सेवन से लक्षणों का बढ़ जाना।  काफी लोगों को चोकलेट, एल्कोहल, गोभी, डेयरी उत्पाद, दूध, तले भुने मसालेदार पदार्थों एवं गेहूं से लक्षण बढ़ जाते हैं। तनाव –आईबीएस के होने में तनाव पूर्ण माहौल का भी अहम रोल हौता है। जिससे आईबीएस या ग्रहणी रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं।

 आनुवंशिकता,  जिन लोगों के परिवार में माता-पिता आदि को यह तकलीफ होती है उनके बच्चों को यह समस्या होने की ज्यादा सम्भावना हो जाती है। आईबीएस ए में रोगी को कभी दस्त लग जाते हैं। कभी कभी कब्ज हो जाते हैं । फाइबर चोकर युक्त आटा, हरी सब्जियों एवं फलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

वो खाना पीना जिसमे आईबीएस के लक्षण बढ़ते हों उनसे बचें। यह हर व्यक्ति के अनुसार अलग अलग हो सकते हैं। एक बार में ज्यादा न खाकर थोड़ा थोड़ा कई बार में लें। खान पान में दही, छाछ आदि ज्यादा शामिल करें। व्यायाम, योगाभ्यास, भ्रमण जरुर करें – नियमित रूप से भ्रमण, योगा, व्यायाम करें, इससे तनाव का स्तर घटता है और खाने का सही से पाचन होता है।

आयुर्वेद में ग्रहणी के वातज, पितज, कफज, सन्निपातज जैसे प्रकार बताये गए हैं तथा ग्रहणी रोग के कारणों, लक्षणों और चिकित्सा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। आयुर्वेद की कई जड़ी बूटियाँ जैसे- बिल्व कुटज चित्रक हरीतकी आंवला आईबीएस रोग में बहुत ही फायदेमंद रहती हैं। पर्पटी कल्प ग्रहणी रोग में आयुर्वेद की विशेष चिकित्सा बताई गई है।

वहीं बता दें एक गिलास ताज़ा छाछ में आधी चम्मच भुना हुआ जीरा पाउडर एवं इतना ही सूखा पिसा हुआ पुदीना पाउडर मिलाकर पीना बहुत ही लाभकारी है।