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ट्रंप–नेतन्याहू युद्ध की कीमत भारत चुका रहा: ब्रह्मा चेलानी

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान को लेकर अमेरिका और इज़राइल के सख्त रुख के बीच भारत की आयात नीति में हुए बदलाव ने देश को तेल आपूर्ति के लिहाज से अधिक संवेदनशील बना दिया है।

Gautam Rishi by Gautam Rishi
2 March 2026
in दुनिया
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भू-राजनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने भारतीय नाविकों की मौत पर उठाए सवाल - Panchayati Times

डॉ. ब्रह्मा चेलानी

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मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान को लेकर अमेरिका और इज़राइल के सख्त रुख के बीच भारत की आयात नीति में हुए बदलाव ने देश को तेल आपूर्ति के लिहाज से अधिक संवेदनशील बना दिया है।

रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, रियायती रूसी कच्चे तेल की खरीद घटाकर पश्चिम एशियाई और अमेरिकी तेल पर निर्भरता बढ़ाने से भारत की जोखिम क्षमता कम हुई है। इससे बढ़ती कीमतों और समुद्री मार्गों में संभावित बाधा का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य बना ‘कमजोर कड़ी’

वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अहम समुद्री रास्ता Strait of Hormuz भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अनुमान है कि भारत के लगभग 50 प्रतिशत कच्चे तेल आयात और करीब 60 प्रतिशत द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति इसी मार्ग से होकर आती है।

रसोई गैस के मामले में स्थिति और भी गंभीर है। देश की लगभग 80 से 85 प्रतिशत एलपीजी आपूर्ति खाड़ी क्षेत्र से आती है और इसे भी इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है। कच्चे तेल के विपरीत, भारत के पास एलपीजी का रणनीतिक भंडार नहीं है, इसलिए आपूर्ति बाधित होने पर घरेलू उपभोक्ताओं पर त्वरित असर पड़ सकता है।

India Pays for the Trump-Netanyahu War

India’s economic growth and energy security are now exposed to the volatile front lines of the Middle East conflict. By slashing imports of discounted Russian oil to their lowest level since March 2022 and ramping up purchases of…

— Dr. Brahma Chellaney (@Chellaney) March 2, 2026

आयात नीति में बदलाव और बढ़ता जोखिम

रूस से सस्ता तेल खरीदने की रणनीति ने बीते वर्षों में भारत को राहत दी थी। लेकिन हाल के महीनों में रूसी आयात घटने और पश्चिम एशिया व अमेरिका से महंगा तेल खरीदने के कारण आयात लागत बढ़ी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से भारत ने कीमत जोखिम को कम करने की कोशिश में आपूर्ति जोखिम बढ़ा लिया है। यदि खाड़ी क्षेत्र में टैंकर यातायात बाधित होता है, तो इसका असर सीधे भारत पर पड़ेगा।

तेल महंगा तो बढ़ेगा आयात बिल

ऊर्जा बाजार विश्लेषण के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में प्रति 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के वार्षिक आयात बिल में लगभग 13 से 14 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इससे महंगाई दर बढ़ने, व्यापार घाटा गहराने और रुपये पर दबाव आने की आशंका रहती है।

भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है।

चीन को मिल सकता है लाभ?

विश्लेषकों का मानना है कि चीन रूस से स्थलीय पाइपलाइन मार्गों के जरिए तेल और गैस की आपूर्ति बढ़ाकर खाड़ी क्षेत्र के जोखिम को कम कर सकता है। इसके विपरीत, भारत की समुद्री मार्गों पर अधिक निर्भरता उसे अधिक असुरक्षित बनाती है।

इस परिदृश्य में बीजिंग अतिरिक्त रूसी आपूर्ति का लाभ उठाकर खुद को खाड़ी संकट से बचा सकता है, जबकि नई दिल्ली को बढ़ती कीमतों और आपूर्ति अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।

आगे की राह क्या?

ऊर्जा विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को आपूर्ति स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडार का विस्तार और वैकल्पिक ऊर्जा साधनों पर तेजी से काम करना होगा।

यह भी पढ़ें: होर्मुज स्ट्रेट क्या है? जिसके बंद होने पर आएगा तेल का संकट, भारत पर भी पड़ेगा असर

मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ सकता है। आने वाले समय में ऊर्जा कूटनीति और संतुलित विदेश नीति भारत के लिए अहम भूमिका निभाएगी।

Tags: ट्रंपनेतन्याहूब्रह्मा चेलानीभारतयुद्ध
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