हिंद महासागर क्षेत्र में हालिया सैन्य घटना ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरान के युद्धपोत IRIS Dena को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबो देने की घटना को कई रणनीतिक विशेषज्ञ भारत के लिए असहज स्थिति मान रहे हैं।
यह जहाज हाल ही में भारत की नौसेना द्वारा आयोजित बहुराष्ट्रीय अभ्यास MILAN 2026 में भाग लेकर लौट रहा था। इस अभ्यास में 18 से अधिक विदेशी युद्धपोत शामिल हुए थे और ईरानी फ्रिगेट भी भारतीय नौसेना के आमंत्रित अतिथि के रूप में इसमें शामिल हुआ था।
समुद्री कूटनीति पर असर
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानीके अनुसार, यह घटना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं है बल्कि इससे भारत की समुद्री कूटनीति पर भी असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि किसी ऐसे युद्धपोत पर हमला करना जो हाल ही में किसी देश द्वारा आयोजित सैन्य अभ्यास में शामिल हुआ हो, आम तौर पर नौसैनिक शिष्टाचार के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्रवाई से यह संदेश जा सकता है कि भारत द्वारा आयोजित सैन्य अभ्यास में भाग लेने वाले देशों के जहाजों की सुरक्षा की गारंटी उस क्षेत्र से बाहर निकलने के बाद सुनिश्चित नहीं रहती।
हिंद महासागर में बढ़ता तनाव
यह हमला श्रीलंका के पास, भारत की समुद्री सीमा के दक्षिण में हुआ बताया जा रहा है। यह वही क्षेत्र है जिसे भारत पारंपरिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर और सुरक्षित समुद्री क्षेत्र बनाए रखना चाहता है। लेकिन इस घटना के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में पश्चिम एशिया से जुड़े संघर्ष के फैलने की आशंका को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
भारत की समुद्री रणनीति पर सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “महासागर” (MAHASAGAR) रणनीति का उद्देश्य भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में प्रमुख सुरक्षा साझेदार के रूप में स्थापित करना है। इस पहल के तहत भारत क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने और समुद्री स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस घटना से यह संकेत मिला है कि दूर स्थित महाशक्तियां भी इस क्षेत्र में बिना समन्वय के सैन्य कार्रवाई कर सकती हैं, जिससे भारत की क्षेत्रीय नेतृत्व की छवि को चुनौती मिल सकती है।
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कूटनीतिक दृष्टि से चुनौती
जहां अमेरिका इस कार्रवाई को युद्धकालीन रणनीतिक कदम मान सकता है, वहीं भारत के दृष्टिकोण से इसे एक असहज कूटनीतिक स्थिति के रूप में देखा जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि इस घटना ने भारत की “सॉफ्ट पावर” आधारित समुद्री कूटनीति को झटका दिया है और हिंद महासागर में शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।









