Bihar Panchayat Election 2026: बिहार में पंचायत चुनावों के आरक्षण को लेकर पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने मो. ईसा की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव में आरक्षण निर्धारित करने के लिए सरकारी नौकरियों वाला बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991 लागू नहीं होगा। मुखिया के चुनाव में आरक्षण का आधार बिहार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) होगी।
31 पन्नों के अपने फैसले में अदालत ने जाति छानबीन समिति के आदेश और उसके आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचित मुखिया को पद से हटाने की कार्रवाई को रद्द कर दिया।
पंचायत चुनाव और सरकारी नौकरी के आरक्षण अलग
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी सेवाओं में आरक्षण और चुनाव में प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण दो अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं। इसलिए सरकारी नौकरियों एवं पदों के लिए बनाए गए वर्ष 1991 के आरक्षण कानून को पंचायत चुनाव में उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता।
अदालत के मुताबिक किसी आरक्षण कानून की व्याख्या उसके उद्देश्य और विधायी व्यवस्था के अनुरूप की जानी चाहिए।
मुखिया चुनाव में धारा 15(5) होगी आधार
फैसले का अहम बिंदु यह है कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण का निर्धारण बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) के तहत होगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसके लिए बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991 को आधार नहीं बनाया जा सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 1991 के कानून की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होती। पंचायत चुनावों के संदर्भ में इसका इस्तेमाल पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों की पहचान के लिए किया जा सकता है।
निर्वाचित मुखिया को हटाने का आदेश रद्द
मामले में जाति छानबीन समिति ने एक निर्वाचित मुखिया के संबंध में कार्रवाई की थी। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने भी उन्हें पद से हटाने का आदेश जारी किया था।
हाईकोर्ट ने दोनों कार्रवाइयों को निरस्त करते हुए माना कि संबंधित प्राधिकारियों ने मामले में गलत कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल किया था।
कोर्ट ने किन आदेशों को रद्द किया?
अदालत ने इस मामले में दो प्रमुख आदेशों को निरस्त कर दिया—
- जाति छानबीन समिति का मेमो नंबर 6574, दिनांक 28 मार्च 2025
- राज्य निर्वाचन आयोग का मेमो नंबर 2876, दिनांक 25 जून 2025
राज्य निर्वाचन आयोग की कार्रवाई पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने जाति छानबीन समिति और राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से हटाने के लिए जिस कानूनी आधार का इस्तेमाल किया गया, वह पंचायत चुनाव में लागू होने वाली आरक्षण व्यवस्था के अनुरूप नहीं था।
इसलिए उस आधार पर की गई कार्रवाई को कायम नहीं रखा जा सकता।
बिहार पंचायत चुनाव पर क्या होगा असर?
हाईकोर्ट के इस फैसले से बिहार में पंचायत चुनावों में आरक्षण को लेकर कानूनी स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण स्पष्टता मिल सकती है। खासकर मुखिया समेत पंचायत प्रतिनिधियों के चुनाव में आरक्षण तय करते समय बिहार पंचायत राज कानून और उसकी संबंधित धाराओं को आधार बनाने की बात सामने आई है।
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इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि पंचायत चुनाव में आरक्षण और सरकारी सेवाओं में आरक्षण को एक ही कानूनी व्यवस्था मानने को लेकर भ्रम की स्थिति बन सकती थी। कोर्ट ने दोनों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया है।








