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Home अजब-गजब

Delhi NCR AQI: इंडिया गेट गायब कर दिया? क्या अब राष्ट्रपति भवन भी गायब करेगा?: बड़ा जादूगर दिल्ली में

लगता है आगे दिल्ली वाले भी गायब हो जायेंगे..कोई बताये कि इसको दिल्ली किसने बुलाया? किसने रुकने दिया?

Parijat Tripathi by Parijat Tripathi
19 November 2024
in अजब-गजब, भारत, राज्यों से, स्वास्थ्य
0
दिल्ली में हम महादेव हैं !

दिल्ली में हम महादेव हैं !

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उन्नीसवीं सदी का महान जादूगर हुडिनी हवा में रस्सी खड़ी कर देता था और उस रस्सी पर चढ़ कर हवा में गायब हो जाता था. यहां तो दिल्ली वालों के पास कोई रस्सी भी नहीं है..वो कहाँ जा कर गायब हों..क्योंकि रस्सी तो उनके गले में पड़ी है और उनका दम घुट रहा है..
ये रस्सी डेढ़ करोड़ दिल्ली वालों के गले में उसी घातक जादूगर ने डाली है जो हर साल नवम्बर दिसम्बर में दिल्ली चला आता है.. और इस बार तो उसने हद ही कर दी.. इण्डिया गेट गायब कर दिया ? अब राष्ट्रपति भवन का नंबर है.. उसके बाद हमारा पार्लियामेंट..ये तो हद है! प्रदूषण की इस रस्सी का साइज़ छोटा है इसमें छोटा गला ही फिट होता है. सरकार का गला मोटा होता है. इसलिए उसको प्रदूषण के फंदे से कुछ नहीं होता है. अंधेर नगरी चौपट राजा की कहानी में भी ऐसा ही तो होता है. जिसका गला फंदे में फिट होता है फांसी फांसी के लिए फिट वही होता है. जय हो !

‘सब मिले हुए हैं जी’

एक बात समझ नहीं आती. ये घातक जादूगर जो बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें गायब कर देता है, इसको दिल्ली कौन बुलाता है? इसे दिल्ली में कौन ठहराता है ? इसको दिल्ली में रहने मदद कौन करता है ? कौन है जो दिल्ली वालों की जान का दुश्मन बना बैठा है?

किससे करे कोई शिकायत

ये सारे सवाल जनता पूछना चाहती है पर डरती है. जनता डरती क्योंकि ये कल्चर डर्टी है दिल्ली में. दिल्ली का पोलिटिकल कल्चर ऐसा है कि दिल्ली की जनता को कोई लतियाये, जुतियाये या जान लेले या उसका कोई नरसंहार करे तो भी जनता उसकी शिकायत नहीं कर सकती.. क्योंकि उसे पता ही नहीं कि जनसंहार हो या नरसंहार हो – शिकायत करनी चाहिए.

डरपोक और नादान जनता

दिल्ली की जनता डरपोक भी है और नादान भी. उसे ये पता ही नहीं कि अपनी जान बचाने का अधिकार उसके पास है. अपनी जान बचाने का ये अधिकार उसे संविधान ने दिया है. ये नरसंहार है दिल्ली के डेढ़ करोड़ लोगों का जो हर साल होता है. लेकिन जनता को अब आदत हो गई है. जनता को मर मर कर जीना आ गया है. इसलिए आपको कोई फर्क पड़े तो पड़े, यहां जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता. ये अज्ञानता है या भीरुता ? ये लापरवाही है या मजबूरी ?

क्या है छह सौ पार का AQI ?

सौ से नीचे AQI अच्छा होता है. सौ के ऊपर चिंता की बात होती है. तीन सौ पर AQI ख़राब माना जाता है. चार सौ पर बहुत खराब की श्रेणी में आता है. पांच सौ पर अति-गंभीर की श्रेणी शुरू हो जाती है और छह सौ पर क्या होगा AQI? ये मशान घाट की श्रेणी है. इसमें सीधे सीधे काण्ड हो जाता है पर काण्ड आदमी का होता है सरकार का नहीं. ऐसा क्यों? मरे तो आदमी क्यों मरे सरकार क्यों नहीं ?

काम सरकार का थोड़ी है!

सब ‘अपना काम’ कर रहे हैं पर काम नहीं हो रहा है. काम आम आदमी का है, हो चाहे न हो -चूल्हे में जाए. किसी को इससे क्या? सुप्रीम कोर्ट सरकार को डाट रहा है. सरकार अधिकारियों को डाटती है. अधिकारी अपनी बीबियों को डाटते हैं. बीबियाँ चपरासियों को डाटती हैं. पर काम नहीं होता. क्योंकि काम का कोई हिसाब नहीं होता है..न कोई हिसाब लेता है न देता है. क्योंकि काम आदमी का होता है. और जो काम आदमी का होता है वो काम कहाँ होता है. मरने जीने का काम तो आदमी का है, सरकार का थोड़ी है.

हर साल यही होता है

हर साल यही होता है. हर साल आम आदमी रोता है पर उसके रोने की आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती. अब प्रदूषण बढ़े और आम आदमी मरे तो सरकार इसमें क्या करे? अब एक ही काम हो सकता है. आम आदमी सांस लेना बंद कर दे तो प्रदूषण कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा उसका. इतनी आसान सी बात है. इस पर इतनी हाय-तौबा क्यों मची है ?
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