उत्तराखंड पंचायत चुनाव को लेकर 12 जिलों में जारी असमंजस अब समाप्त हो गया है। नैनीताल हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अहम फैसला सुनाते हुए इन जिलों में पंचायत चुनाव प्रक्रिया पर लगी रोक को हटा दिया है। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह निर्णय सुनाया, जिससे राज्य सरकार को बड़ी राहत मिली है।
क्या है मामला
बागेश्वर जिले के निवासी गणेश कांडपाल समेत कई अन्य याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार द्वारा 9 जून और 11 जून को जारी की गई नियमावली और परिपत्र को चुनौती दी थी। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि सरकार ने नई नियमावली के माध्यम से पूर्व में लागू आरक्षण रोस्टर को शून्य घोषित कर दिया है और एक नया रोस्टर लागू करते हुए उसे वर्तमान चुनाव से प्रभावी माना गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे न केवल आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुरूप नहीं है। उन्होंने इसे पूर्व के आरक्षण अधिकारों का हनन बताया।
हाईकोर्ट का फैसला
सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत दलीलों को स्वीकार करते हुए चुनाव प्रक्रिया पर लगी रोक हटाने का आदेश दिया। कोर्ट का मानना है कि सरकार को प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत आरक्षण रोस्टर को संशोधित करने और लागू करने का अधिकार है, जब तक कि यह प्रक्रिया संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप हो।

सरकार को राहत, चुनाव प्रक्रिया होगी शुरू
इस फैसले के बाद अब राज्य सरकार त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकेगी। सरकार ने पहले ही चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी थीं, लेकिन याचिकाओं के चलते प्रक्रिया पर रोक लग गई थी। अब इस निर्णय से चुनाव कार्यक्रम तय किए जाने का रास्ता साफ हो गया है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा
कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी हलचल देखी जा रही है। एक ओर जहां सरकार ने इसे न्यायसंगत और लोकतंत्र के हित में बताया है, वहीं कुछ विपक्षी दलों ने सवाल खड़े किए हैं कि रोस्टर प्रणाली में अचानक बदलाव क्यों किया गया।
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अब देखना यह होगा कि राज्य निर्वाचन आयोग इस फैसले के बाद पंचायत चुनाव की तिथि जल्द घोषित करता है या नहीं।









