राजस्थान के जालोर जिले के 15 गांवों में बहू-बेटियों के स्मार्टफोन इस्तेमाल पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने गंभीर रुख अपनाया है। आयोग ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए जिला कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गवांडे को नोटिस जारी किया है और 14 दिनों के भीतर जांच कर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं।
आयोग का कहना है कि यह फैसला केवल महिलाओं पर लागू किया गया, जो साफ तौर पर लिंग आधारित भेदभाव को दर्शाता है। NHRC ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पंचायत या सामाजिक संगठन को महिलाओं की संचार स्वतंत्रता या तकनीक के उपयोग पर रोक लगाने का अधिकार नहीं है।
कैसे सामने आया मामला
यह विवाद 21 दिसंबर को उस समय सामने आया, जब चौधरी समाज सुंधामाता पट्टी की गाजीपुर गांव में हुई बैठक में एक अहम फैसला लिया गया। 14 पट्टी के अध्यक्ष सुजनाराम चौधरी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में तय किया गया कि 15 गांवों की महिलाओं को 26 जनवरी से कैमरा वाले मोबाइल फोन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी।
की-पैड मोबाइल तक सीमित करने का आदेश
इस निर्णय के तहत महिलाओं को सामाजिक कार्यक्रमों, सार्वजनिक आयोजनों और यहां तक कि रिश्तेदारों या पड़ोसियों के घर जाते समय भी स्मार्टफोन रखने से मना किया गया था। उन्हें केवल की-पैड मोबाइल फोन उपयोग करने का निर्देश दिया गया था। जैसे ही यह फैसला सार्वजनिक हुआ, सामाजिक संगठनों और आम लोगों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया।
खाप पंचायत की दलील
विवाद बढ़ने के बाद समाज अध्यक्ष सुजनाराम चौधरी ने तर्क दिया था कि महिलाओं के स्मार्टफोन का इस्तेमाल बच्चे करते हैं, जिससे उनकी आंखों पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि विरोध के चलते बाद में इस फैसले को वापस ले लिया गया।
शिकायत के बाद NHRC ने लिया संज्ञान
इस पूरे मामले को लेकर पश्चिम बंगाल नेशनल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो नामक एनजीओ के मनीष जैन ने 2 जनवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखित शिकायत भेजी थी। इसके आधार पर आयोग ने मामले में हस्तक्षेप किया।
NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो ने जालोर जिला प्रशासन को जारी नोटिस में कहा कि लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया महिलाओं के मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं। ऐसे फैसले भविष्य में लड़कियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।
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कलेक्टर का बयान
जालोर जिला कलेक्टर डॉ. प्रदीप के. गवांडे ने बताया कि आयोग की ओर से नोटिस मिल चुका है। उन्होंने कहा कि भले ही संबंधित समाज ने अपना फैसला वापस ले लिया हो, फिर भी पूरे घटनाक्रम की जांच कर तय समय सीमा के भीतर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट भेजी जाएगी।









