Shubhanshu Shukla’s 18 days in space: भारत की अंतरिक्ष कहानी के एक नए अध्याय की शुरूआत तब हुई, जब ‘ड्रैगन’ कैप्सूल ने कैलिफ़ोर्निया के तट पर सुरक्षित लैंडिंग की। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने 18 दिनों की अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की यात्रा पूरी करने के बाद धरती पर वापसी की। यह न केवल उनके ऐतिहासिक मिशन की सफलता थी, बल्कि भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि रही।

उनका मिशन सिर्फ अंतरिक्ष यात्रा भर नहीं था। शुक्ला ने कमांडर पेगी व्हिटसन, पोलैंड के स्लावोस्ज़ उज़नान्स्की, और हंगरी के टिबोर कापू के साथ मिलकर दुनिया भर से वैज्ञानिक प्रयोग किए। जिनमें भारत के भी सात वैज्ञानिक प्रयोग शामिल थे। ये सभी प्रयोग अंतरिक्ष में जैविक और भौतिक प्रभावों को समझने पर केंद्रित थे।
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भारत के सात अंतरिक्ष प्रयोग
बीजों के अंकुरण से लेकर मांसपेशियों पर पड़ने वाले तनाव तक, इन प्रयोगों ने यह समझने की कोशिश की कि शून्य गुरुत्वाकर्षण में जीवन कैसे प्रभावित होता है। IISc बेंगलुरु, ICGEB, और IIST जैसे संस्थानों ने टार्डीग्रेड (सूक्ष्म जीव), फसलों की वृद्धि, कोशिकाओं पर पोषक तत्वों के प्रभाव और इलेक्ट्रॉनिक इंटरैक्शन जैसे विषयों पर रिसर्च भेजा।
भविष्य की अंतरिक्ष उड़ानों की तैयारी
ये प्रयोग भारत के मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन, गगनयान और भविष्य के भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए महत्वपूर्ण डेटा जुटाने का हिस्सा थे। IISc के प्रोफेसर आलोक कुमार, जो शुक्ला के एमटेक गाइड भी रहे हैं, ने कहा, ‘अंतरिक्ष बेहद कठोर और क्षमाहीन है, इसलिए हमें हर कदम सीखते हुए सावधानी से आगे बढ़ना होगा।’
गर्व और सीख, दोनों का क्षण
Axiom-4 मिशन केवल गौरव का विषय नहीं था, बल्कि यह भारत की आने वाली अंतरिक्ष उड़ानों के लिए एक शिक्षाप्रद कदम भी था। जैसे-जैसे भारत चंद्रमा मिशनों और अपने स्वतंत्र अंतरिक्ष स्टेशन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, इस मिशन से मिली जानकारी भविष्य को और अधिक सुरक्षित और समझदारी भरा बनाएगी।









