कक्षा 8 की एनसीईआरटी (NCERT) की सोशल साइंस किताब में शामिल ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक अध्याय को लेकर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कड़ी नाराजगी जताते नजर आए और स्पष्ट किया कि केवल माफी मांग लेने से मामला बंद नहीं होगा।
किन जजों की बेंच ने की सुनवाई?
इस मामले की सुनवाई तीन जजों की पीठ ने की, जिसमें शामिल थे:
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत
- जस्टिस जॉयमाल्या बागची
- जस्टिस विपुल एम. पंचौली
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने भी चैप्टर की सामग्री पर आपत्ति दर्ज कराई।
क्या है पूरा मामला?
कक्षा 8 की नई सोशल साइंस पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक से एक अध्याय शामिल किया गया है। इस अध्याय में अदालतों में लंबित मामलों और न्याय व्यवस्था से जुड़े मुद्दों का उल्लेख है। साथ ही पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई के एक बयान का संदर्भ भी दिया गया है, जिसे लेकर विवाद खड़ा हुआ।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समाचार रिपोर्ट के जरिए उन्हें इस सामग्री की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने अपने सेक्रेटरी जनरल से पुष्टि करने को कहा कि क्या वाकई ऐसी किताब प्रकाशित हुई है। उन्हें बताया गया कि संबंधित सामग्री को एनसीईआरटी निदेशक ने उचित ठहराया है, जिसे अदालत ने “अवमाननापूर्ण” बताया।
CJI की कड़ी टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा:
- लोकतंत्र के तीन स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक हैं।
- न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश गंभीर मामला हो सकता है।
- यदि यह जानबूझकर किया गया है, तो यह आपराधिक अवमानना का विषय बन सकता है।
- केवल यह कहना कि सामग्री हटाई जा रही है, पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि बाजार और स्कूलों में भेजी गई किताबें वापस ली जाएं और ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री को भी हटाया जाए।
‘माफी से काम नहीं चलेगा’
शिक्षा विभाग की ओर से माफी मांगी गई, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि इस सामग्री के पीछे कौन जिम्मेदार है, तब तक सुनवाई जारी रहेगी।
CJI ने यह भी कहा कि किताबें सिर्फ बच्चों तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि शिक्षक, अभिभावक और व्यापक समाज भी इन्हें पढ़ता है। ऐसे में पक्षपातपूर्ण या संदर्भहीन सामग्री भविष्य की पीढ़ियों की सोच को प्रभावित कर सकती है।
न्यायपालिका की भूमिका पर जोर
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पुस्तक में न्यायपालिका द्वारा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, कानूनी सहायता और सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ दिए गए महत्वपूर्ण फैसलों का समुचित उल्लेख नहीं किया गया।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रचनात्मक और सद्भावना से की गई आलोचना पर रोक नहीं है। लेकिन किसी संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री स्वीकार्य नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि मामले की गहन जांच होगी और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि वह सुनवाई बंद नहीं करेगी जब तक पूरी सच्चाई सामने न आ जाए।
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इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा सामग्री, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह मामला देश की शिक्षा व्यवस्था और न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा अहम मुद्दा बन सकता है।









