हर साल अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर पराली जलाने के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। बुधवार को हुई सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई (CJI BR Gavai) और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि “अब वक्त आ गया है कि पराली जलाने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए।”
कोर्ट ने कहा – जेल भेजिए, तभी मिलेगा संदेश
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि कुछ किसानों को जेल भेजना एक प्रभावी संदेश हो सकता है। सीजेआई गवई ने टिप्पणी करते हुए कहा, “हम किसानों का सम्मान करते हैं, वे देश का पेट भरते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें हर नियम से ऊपर रखा जाए। अगर पर्यावरण को बचाना है तो सख्त कदम जरूरी हैं।”
एमिकस क्यूरी ने जताई निराशा
इस केस में एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने कोर्ट को बताया कि सरकारें सब्सिडी और मशीनें उपलब्ध कराने का दावा तो करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। उन्होंने कहा, “किसान वही पुराने बहाने बना रहे हैं कि जब सैटेलाइट घूमती है, तभी उन्हें रोकते हैं। 2018 से सुप्रीम कोर्ट इस विषय में गंभीर आदेश देता आ रहा है, फिर भी स्थितियां नहीं सुधर रही हैं।”
सरकारें क्यों नहीं बना रहीं सख्त कानून?
सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि अब तक किसानों के खिलाफ सख्त दंडात्मक प्रावधान क्यों नहीं बनाए गए हैं। कोर्ट ने राज्यों को फटकार लगाते हुए कहा कि “अगर पर्यावरण की इतनी चिंता है तो कानून बनाने में हिचक क्यों?” कोर्ट ने साफ किया कि सभी किसानों को सजा देने की बात नहीं हो रही, बल्कि कुछ मामलों में प्रभावी उदाहरण स्थापित करने की जरूरत है।

राज्यों की दलील – छोटे किसानों की बेबसी
सुनवाई के दौरान राज्यों ने दलील दी कि अब तक जिन किसानों को गिरफ्तार किया गया, वे अधिकतर छोटे और सीमांत किसान थे। ऐसे में यदि उन्हें सजा दी जाती है, तो उनके परिवार और उन पर निर्भर लोग प्रभावित होंगे। इस पर सीजेआई ने कहा, “हम यह नहीं कह रहे कि इसे सामान्य प्रक्रिया बना दें, पर एक सख्त उदाहरण जरूर जरूरी है, जिससे बाकी किसानों को भी चेतावनी मिले।”
पंजाब सरकार का पक्ष – हालात में सुधार
पंजाब सरकार की ओर से पेश वकील राहुल मेहरा ने कोर्ट को बताया कि पराली जलाने की घटनाओं में अब कमी आई है, और सरकार प्रयास कर रही है कि आने वाले वर्षों में ये मामले और घटें।
उल्लेखनीय है कि हर साल पंजाब और हरियाणा में बड़ी संख्या में किसान पराली जलाते हैं, जिससे उठने वाला धुआं दिल्ली-एनसीआर में स्मॉग और प्रदूषण के स्तर को गंभीर बना देता है। किसानों का कहना है कि खेतों को साफ करने के लिए मजदूरों को रखना या मशीनों का इस्तेमाल करना उनके लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख साफ संकेत देता है कि अब पराली जलाने के मसले पर मौखिक अपीलों से आगे जाकर सख्त कदम उठाने का समय आ गया है। पर्यावरण संकट को देखते हुए, कानूनों का पालन अनिवार्य करना ही एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है। अब देखना होगा कि राज्य सरकारें इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती हैं और क्या वाकई कोई ठोस कार्रवाई जमीन पर दिखाई देती है या नहीं।









