अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC-ST Act के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। याचिका में कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर सवाल उठाते हुए दावा किया गया था कि उत्पीड़न से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाए गए इस कानून के कुछ प्रावधानों का कथित तौर पर दुरुपयोग हो सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही वर्ष 2020 में इस कानून की वैधता और इससे जुड़े संशोधनों को बरकरार रख चुका है। ऐसे में महज छह साल बाद उसी मुद्दे पर दोबारा विचार करने का कोई पर्याप्त आधार नजर नहीं आता।
याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत के समक्ष SC/ST Act के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि कानून के तहत शुरुआती जांच के बिना FIR दर्ज करने और आरोपी की गिरफ्तारी की व्यवस्था से इसके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है।
वकील ने विशेष रूप से धारा 18 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत SC/ST Act के मामलों में अग्रिम जमानत के संबंध में कड़े प्रतिबंध हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई से पहले तथ्यों की प्रारंभिक जांच की व्यवस्था होने से कानून के संभावित दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
मुआवजे के प्रावधान पर भी उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने SC/ST Act के तहत पीड़ित या शिकायतकर्ता को मुकदमे की शुरुआती अवस्था में दिए जाने वाले मुआवजे का मुद्दा भी उठाया।
उन्होंने राज्यसभा में दी गई जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि इस व्यवस्था के तहत शिकायतकर्ताओं को सरकार की ओर से बड़ी राशि का भुगतान किया गया है। उनका तर्क था कि ऐसी व्यवस्था का गलत शिकायतों को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका है।
हालांकि, इस दलील पर पीठ ने कड़ी आपत्ति जताई। पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची ने इस तर्क को रोकते हुए इसे ‘क्रूर’ बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं की याचिका पर सुनवाई?
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए 2020 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ दिया।
कोर्ट ने कहा कि छह साल पहले कानून से जुड़े इसी मुद्दे पर फैसला दिया जा चुका है और उस फैसले के बाद दोबारा इस विषय पर विचार करने का कोई पर्याप्त कारण दिखाई नहीं देता।
इस तरह अदालत ने SC/ST Act के मौजूदा प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर आगे सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
2018 में भी SC/ST Act को लेकर हुआ था विवाद
SC/ST Act के प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में इससे पहले भी महत्वपूर्ण सुनवाई हो चुकी है। वर्ष 2018 में ‘सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कानून के सख्त प्रावधानों को लेकर कुछ सुरक्षा उपाय सुझाए थे।
उस समय अदालत ने कहा था कि कुछ परिस्थितियों में गिरफ्तारी से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति और FIR दर्ज करने से पहले DSP स्तर के अधिकारी से प्रारंभिक जांच जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
इस फैसले के बाद देशभर में विरोध हुआ था। इसके बाद संसद ने कानून में संशोधन करते हुए धारा 18A जोड़ी।
संसद ने SC/ST Act में क्या बदलाव किया?
धारा 18A के जरिए यह स्पष्ट किया गया कि SC/ST Act के तहत FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच आवश्यक नहीं होगी। इसके अलावा आरोपी की गिरफ्तारी के लिए किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होने की बात भी कानून में स्पष्ट की गई।
बाद में वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनी बदलावों को बरकरार रखा था। मौजूदा मामले में पीठ ने इसी पुराने फैसले का हवाला देते हुए कानून के प्रावधानों पर दोबारा विचार करने से इनकार कर दिया।







