Agricultural Revolutions in India: 1966 से 2025 तक, भारत में ‘हरित क्रांति’ से ‘स्वर्णिम क्रांति’ तक का सफर देखा गया है। 1960 के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना था, जिसमें उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYV) के बीजों, उर्वरकों और सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया था. इसके बाद, 1991 से 2003 की अवधि को ‘स्वर्णिम क्रांति’ के रूप में जाना जाता है, जो मुख्य रूप से शहद उत्पादन और बागवानी (जैसे फल, सब्जियां, फूल, मसाले, आदि) के विकास पर केंद्रित थी।
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देश की कृषि क्षेत्र में प्रमुख क्रांतियां
हरित क्रांति (1966-1991)
जब भूख से लड़ाई में बीज बने हथियार और क्रांति के जनक थे- MS स्वामीनाथन। लक्ष्य था, खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करना, विशेष रूप से गेहूं और चावल।
तरीके:
HYV बीजों, उर्वरकों, कीटनाशकों, सिंचाई और मशीनीकरण का उपयोग.
परिणाम:
खाद्यान्न उत्पादन में भारी वृद्धि और भारत को खाद्य संकट से उबारना.
श्वेत क्रान्ति..साल (1970)
जब गांव का दूध शहरों तक बहा।
जनक: Dr Verghese kurien
ऑपरेशन फ्लड से दूध बढ़ा और अमूल मॉडल से हर किसान जुड़ा।
भारत बना दुनिया का नंबर 1 दूध उत्पादक
नीली क्रांति (1985)
जनक: Dr Hiralal chaudhary
मछली पालन को बढ़ावा मिला…जिससे किसानों की कमाई में उछाल देखने को मिला।
पीली क्रांति (1986)
जब तिलहन बना आत्मनिर्भरता का आधार
जनक: Sam Pitroda
विदेशी तेल पर निर्भरता कम और सरसों, मूंगफली और सोयाबीन के उत्पादन में वृद्धि।
किसानों की फसल और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला।
गोल्डन क्रांति (1991 से 2003)
जब फूल, फल और शहद से खिला खेत
जनक: Nirpakh tutje
Cold storage, Export और बागवानी को मिली रफ्तार।
शहद बना किसानों की मीठी आमदनी..और
भारत ने दुनिया में नया परचम फहराया।
अन्य क्रांतियां
सिल्वर क्रांति: अंडे का उत्पादन।
पीली क्रांति: तिलहन उत्पादन.
भूरी क्रांति: चमड़ा और गैर-पारंपरिक वस्तुएं
गोल क्रांति: आलू उत्पादन.









