बिहार मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सियासी गलियारों में जातीय समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने नए मंत्रियों के चयन में सामाजिक और जातीय संतुलन साधने की रणनीति अपनाई है। खासतौर पर भाजपा ने सवर्ण, पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित समुदायों के बीच संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है।
सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय का नाम मंत्रिमंडल से बाहर रहने को लेकर हो रही है। लंबे समय से बिहार भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल मंगल पांडेय को इस बार जगह नहीं मिलने से राजनीतिक अटकलें तेज हैं।
बीजेपी ने किन जातीय समूहों को दिया प्रतिनिधित्व
भाजपा की ओर से मंत्रिमंडल में अलग-अलग सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। अति पिछड़ा वर्ग से रामचंद्र प्रसाद और प्रमोद चंद्रवंशी को मौका मिला है, जबकि मल्लाह समाज से आने वाली रमा निषाद को भी शामिल किया गया है।
दलित समाज से नंद किशोर राम और लखेंद्र पासवान को मंत्री बनाया गया है। वहीं पिछड़ा वर्ग और वैश्य समुदाय से दिलीप जायसवाल, रामकृपाल यादव और अरुण शंकर प्रसाद जैसे नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है।
सवर्ण वर्ग में भी भाजपा ने संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। भूमिहार समाज से विजय कुमार सिन्हा और ई कुमार शैलेन्द्र को प्रतिनिधित्व मिला है, जबकि राजपूत समाज से श्रेयसी सिंह और संजय टाइगर को शामिल किया गया है। ब्राह्मण समाज से मिथलेश तिवारी और नीतीश मिश्रा को मंत्री बनाया गया है।
सहयोगी दलों को भी मिला सामाजिक प्रतिनिधित्व
चिराग पासवान की पार्टी की ओर से भी जातीय संतुलन साधने की कोशिश दिखी। पार्टी के मंत्रियों में राजपूत (संजय सिंह) और दलित समुदाय (संचय सिंह) के नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया गया है।
वहीं राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) की तरफ से उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को जगह मिली है, जो कुशवाहा समाज से आते हैं। इसे कुशवाहा वोट बैंक को साधने की रणनीति माना जा रहा है।
हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (सेक्युलर) की ओर से संतोष सुमन को मंत्री बनाया गया है। वे दलित समाज का बड़ा चेहरा माने जाते हैं और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माझी के बेटे हैं।
चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर बना संतुलन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में आगामी चुनावों को देखते हुए NDA ने सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर मंत्रिमंडल का गठन किया है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं, ऐसे में हर बड़े समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है।
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भाजपा और उसके सहयोगी दलों का यह कदम आने वाले समय में राज्य की राजनीति पर बड़ा असर डाल सकता है।









