Trump increase h1b visa fees: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत को झटका दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत H-1B वीज़ा की फीस बढ़ाकर सालाना 1 लाख डॉलर (लगभग 83 लाख) कर दी गई है। यह कदम ट्रंप सरकार ने उस वक्त उठाया है जब भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते टैरिफ का कशमकश जारी है।
भारतीय कंपनियों द्वारा कुल 13,396 H-1B वीज़ा स्पॉन्सर किए गए हैं। नए आदेश से H-1B वीज़ा फीस लगभग 13.4 मिलियन डॉलर से बढ़कर 1.34 बिलियन डॉलर हो जाएगी, जो FY25 में TCS, Infosys, HCLTech, Cognizant और LTIMindtree के सम्मिलित शुद्ध मुनाफे का लगभग 10% है। ऐसे में, सोमवार को ट्रेडिंग गतिविधियां शुरू होने पर भारतीय आईटी कंपनियों के शेयरों में दबाव देखने को मिल सकता है।
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अमेरिका में सूचीबद्ध कंपनियों में Cognizant Technology Solutions का शेयर Nasdaq पर लगभग 4.75% टूट गया, जबकि Infosys का शेयर NYSE पर 3.40% गिरा। हालांकि, इसका दबाव अमेरिकी टेक कंपनियों पर भी पड़ेगा। NVIDIA, Amazon, Tesla, Meta, Alphabet जैसी कंपनियाँ भी लंबे समय में असर महसूस करेंगी।
भारतीय आईटी कंपनियों पर खतरा
स्टॉक मार्केट विशेषज्ञों का कहना है कि H-1B वीज़ा पर निर्भर भारतीय आईटी और टेक कंपनियों को टैलेंट पूल संकट का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, अमेरिकी टेक कंपनियों जैसे Apple, Meta, Amazon, Google, NVIDIA, Tesla आदि को भी यही समस्या होगी, क्योंकि ट्रंप के H-1B वीज़ा शुल्क बढ़ाने के बाद उन्हें अमेरिकी टेकियों को नौकरी पर रखना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में कंपनियों को बढ़ी हुई लागत का सामना करना होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी टेक प्रोफेशनल्स भारतीयों की तुलना में अधिक वेतन मांगते हैं, जबकि भारतीय कर्मचारी तकनीकी रूप से अधिक सक्षम माने जाते हैं। यह कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डाल सकता है, और इसका असर सोमवार को जब दलाल स्ट्रीट खुलेगी तो बाज़ार डिस्काउंट करने की कोशिश करेगा।
भारतीय टेक कंपनियों के लिए बड़ा खतरा
SMC Global Securities की सीनियर रिसर्च एनालिस्ट सीमा श्रीवास्तव ने कहा, ‘अमेरिकी सरकार का सितंबर 21, 2025 से हर H-1B वीज़ा पर सालाना 1 लाख डॉलर शुल्क लगाने का अप्रत्याशित फैसला, अमेरिका में बड़े पैमाने पर काम करने वाली भारतीय और अमेरिकी सूचीबद्ध आईटी कंपनियों दोनों को बुरी तरह प्रभावित करेगा। TCS, Infosys, Wipro, HCL Technologies और Cognizant जैसी बड़ी भारतीय आईटी कंपनियाँ अमेरिकी प्रोजेक्ट्स के लिए H-1B प्रोग्राम पर निर्भर हैं। ऐसे में यह शुल्क वृद्धि उनकी लागत को बहुत बढ़ा देगी और प्रतिस्पर्धात्मकता घटा देगी।”
अमेरिकी टेक कंपनियों के लिए खतरा
सीमा श्रीवास्तव ने कहा कि यह खतरा अमेरिकी कंपनियों पर भी लागू होता है। ‘अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, एप्पल और मेटा जैसी अमेरिकी टेक कंपनियाँ भी बड़ी संख्या में H-1B प्रोफेशनल्स, खासकर भारत से, नियुक्त करती हैं और अब उन्हें स्टाफिंग खर्चों में भारी वृद्धि का सामना करना पड़ेगा। कंपनियाँ केवल अहम और वरिष्ठ भूमिकाओं के लिए ही स्पॉन्सरशिप को प्राथमिकता देंगी।
नतीजतन, जूनियर और मिड-लेवल भर्तियों में तेज़ गिरावट होगी, खासकर मिड-साइज़ आईटी कंपनियों और स्टार्टअप्स में। इस नीति बदलाव से अधिक नौकरियाँ अमेरिका से बाहर रह जाएंगी। स्टॉक मार्केट की प्रतिक्रिया भी दोनों ओर (भारत और अमेरिका) लाभप्रदता और टैलेंट फ्लो को लेकर गहरी चिंता दिखाती है।’









