हिमाचल पंचायत चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य निर्वाचन प्रक्रिया के तहत आरक्षण रोस्टर जारी होने के बाद अब गांव-गांव में चुनावी माहौल बनना शुरू हो गया है। संभावित उम्मीदवार पारंपरिक प्रचार के साथ-साथ सोशल मीडिया और एआई तकनीक का भी सहारा ले रहे हैं, जहां पोस्टर और बैनर डिजिटल तरीके से तैयार कर अपनी दावेदारी पेश की जा रही है।
बड़ी संख्या में लोग चुनाव से बाहर
राज्य में करीब 1.67 लाख ऐसे लोग हैं, जिन्हें इस बार पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलेगी। जानकारी के मुताबिक इन लोगों पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आरोप हैं। इन कब्जों को नियमित करने के लिए आवेदन जरूर किए गए हैं, लेकिन जब तक उन्हें संबंधित अनुमति (एनएओसी) नहीं मिलती, तब तक वे चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। इस मुद्दे पर पहले हाईकोर्ट सख्त रुख अपना चुका है, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है।
सरकार का सख्त रुख
सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने चुनावी पारदर्शिता को ध्यान में रखते हुए कई अहम फैसले लिए हैं। हाल ही में राज्य में कानून में संशोधन कर चिट्टा (ड्रग) तस्करी में शामिल आरोपियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई है। जिन व्यक्तियों पर ऐसे मामलों में आरोप तय हो चुके हैं, वे चुनावी मैदान में नहीं उतर पाएंगे।
इसके अलावा सहकारी बैंकों के डिफॉल्टर, रिकवरी के दायरे में आने वाले लोग और सरकारी भूमि पर कब्जा करने वाले भी चुनाव प्रक्रिया से बाहर रहेंगे।
3757 पंचायतों के लिए रोस्टर जारी
राज्य सरकार ने 3757 पंचायतों के लिए आरक्षण रोस्टर जारी कर दिया है। इसमें लगभग आधे पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर महिला भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।
तय समय सीमा में होंगे चुनाव
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट किया है कि पंचायत चुनाव 31 मई से पहले हर हाल में पूरे कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि प्रशासन इस दिशा में पूरी तैयारी कर रहा है और समयसीमा का पालन सुनिश्चित किया जाएगा।
यह भी पढ़ें: इस बैंक ने लोन किया सस्ता, ब्याज दर घटाया
इस बार के पंचायत चुनावों में जहां एक ओर तकनीक का इस्तेमाल बढ़ता दिख रहा है, वहीं दूसरी ओर सख्त नियमों के चलते चुनावी मैदान पहले से अधिक पारदर्शी और अनुशासित होने की उम्मीद है।









