केंद्रीय मंत्रिपरिषद में मत्स्य पालन तथा अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति द्वारा उनका इस्तीफा स्वीकार किए जाने के साथ ही उनका मंत्री पद तत्काल प्रभाव से समाप्त हो गया है। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
क्यों देना पड़ा इस्तीफा?
जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा कार्यकाल हाल ही में समाप्त हुआ था। उन्हें मध्य प्रदेश से उच्च सदन के लिए चुना गया था, लेकिन इस बार हुए राज्यसभा चुनाव में उन्हें दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इसके चलते वे संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं रहे।
भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुसार मंत्री पद पर बने रहने के लिए निर्धारित अवधि के भीतर संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया।
राष्ट्रपति ने मंजूर किया इस्तीफा
राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 75(2) के तहत जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। इसके बाद केंद्रीय मंत्रिपरिषद में उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।
केरल की राजनीति में क्यों अहम हैं जॉर्ज कुरियन?
जॉर्ज कुरियन को केंद्र सरकार में शामिल किया जाना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया था। खासकर केरल में उनकी नियुक्ति को भाजपा की व्यापक रणनीति का हिस्सा समझा गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी ने राज्य के ईसाई समुदाय तक अपनी पहुंच मजबूत करने के उद्देश्य से उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान दिया था। केरल में ईसाई मतदाता बड़ी संख्या में मौजूद हैं और राज्य की राजनीति में उनका प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है।
भाजपा की दक्षिण भारत रणनीति से जुड़ा था नाम
लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में अपने संगठनात्मक विस्तार पर विशेष जोर दिया। इसी दौरान जॉर्ज कुरियन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी नियुक्ति केवल प्रशासनिक फैसला नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की रणनीति का भी हिस्सा थी। इससे पार्टी ने अल्पसंख्यक समुदायों के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास किया।
लंबा रहा संगठनात्मक और राजनीतिक सफर
जॉर्ज कुरियन लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं। पार्टी के शुरुआती दौर से सक्रिय रहने वाले नेताओं में उनकी गिनती होती है। संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाने के अलावा उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके अलावा केंद्र सरकार में विभिन्न प्रशासनिक और राजनीतिक दायित्वों के दौरान उन्होंने संगठन और शासन दोनों स्तरों पर अनुभव हासिल किया।
जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे के बाद अब यह चर्चा शुरू हो गई है कि सरकार उनकी जगह किस नेता को जिम्मेदारी सौंप सकती है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि भाजपा केरल और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक रणनीति को किस प्रकार आगे बढ़ाती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों और दक्षिण भारत में पार्टी की विस्तार योजनाओं को देखते हुए आने वाले समय में नए राजनीतिक समीकरण सामने आ सकते हैं।
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जॉर्ज कुरियन का केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी हैं। राज्यसभा सदस्यता समाप्त होने के बाद लिया गया यह कदम नियमों के अनुरूप है, लेकिन इससे केरल की राजनीति, भाजपा की दक्षिण भारत रणनीति और केंद्र सरकार के आगामी मंत्रिमंडलीय समीकरणों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।









