2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने बड़े इरादों के साथ मैदान में कदम रखा था। महागठबंधन (Grand Alliance) के तहत 70 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन नतीजा बेहद निराशाजनक रहा, केवल 19 सीटों पर जीत और 27 प्रतिशत की कमजोर स्ट्राइक रेट। यह प्रदर्शन लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाले गठबंधन के लिए कमज़ोर कड़ी (Achilles’ heel) साबित हुआ। 243 सदस्यीय विधानसभा में गठबंधन को 110 सीटें मिलीं, जो बहुमत से सिर्फ 12 कम थीं।
चुनाव के बाद समीक्षा तेज और कठोर रही। कांग्रेस का फीका प्रचार अभियान, आरजेडी के साथ कमजोर तालमेल और राहुल गांधी की अनियमित मौजूदगी ने संभावित जीत को हार में बदल दिया। गठबंधन के पास आंकड़े थे, लेकिन ज़मीन पर तालमेल नहीं था।
2025 में वही कहानी दोहराने की तैयारी
अक्टूबर 2025 में तस्वीर लगभग वैसी ही दिख रही है। बिहार में दो चरणों में मतदान 6 और 11 नवंबर को होगा, जबकि मतगणना 14 नवंबर को तय है। मगर इस बार भी कांग्रेस, INDIA ब्लॉक की कमजोर कड़ी बनती दिख रही है।
जहां NDA ने तेजी से सीट फॉर्मूला तय कर लिया, भाजपा और जदयू 101-101 सीटें, और छोटे सहयोगियों जैसे LJP(RV) को 29 सीटें। वहीं महागठबंधन (RJD, कांग्रेस, वामदल और विकासशील इंसान पार्टी) में अब भी सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है।
यह भी पढ़ें- Good News! अब PF Account से निकाल पाएंगे पूरा पैसा, लेकिन पहले जान लें ये नियम
यह केवल देरी नहीं, बल्कि 2020 की वही अहमकाना आत्मविश्वास है जो एनडीए को शुरुआती बढ़त दिला सकता है, खासकर तब जब नीतीश कुमार की पलटी राजनीति के कारण राज्य में एंटी-इनकम्बेंसी तेज है।
सीट बंटवारे पर टकराव
गठबंधन की रुकावट की जड़ कांग्रेस की 60 से अधिक सीटों की मांग है। जिसे सहयोगी दल अव्यवहारिक मानते हैं, क्योंकि पार्टी की ज़मीन पर पकड़ बहुत कमजोर है।
2020 में भी कांग्रेस की इसी सीट ओवररीच ने गठबंधन की हार तय की थी, RJD की 75 सीटें भी कांग्रेस की कमजोरी की भरपाई नहीं कर सकीं। अब इतिहास दोहराने का खतरा है।
सूत्रों के मुताबिक, लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस को 52–58 सीटों का ऑफर दिया है। कुछ सीटें जैसे बछवाड़ा, औराई, हरलाखी, मटिहानी, और परबत्ता अब भी चर्चा में हैं। वहीं, CPI(ML) के नेता दिपांकर भट्टाचार्य ने कांग्रेस को वास्तविकता में लौटने और केवल जीतने योग्य सीटों पर ध्यान देने की सलाह दी है।
इसके बावजूद, कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति ने 25 उम्मीदवारों को हरी झंडी दे दी है और बिहार इकाई को 243 सीटों की तैयारी करने का निर्देश दिया है। जिसे सहयोगी दल धमकाने की रणनीति (brinkmanship) या अलग चुनाव लड़ने की तैयारी के रूप में देख रहे हैं।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया तीखी रही। एक यूज़र ने लिखा, ‘बिना संगठन और ज़मीनी उपस्थिति के कांग्रेस की 65–70 सीटों की मांग बेहद शर्मनाक है।’
अभियान में कमी
राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ गया से पटना तक 1,300 किमी की पदयात्रा ने अगस्त में थोड़ी चर्चा बटोरी थी। इसका मकसद चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न के दौरान 65 लाख नामों की कथित विलोपन के खिलाफ जागरूकता फैलाना था। लेकिन जो अभियान शुरुआत में दमदार दिखा, वह धीरे-धीरे विश्वसनीयता संकट में बदल गया।
‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की रिपोर्ट में लगभग 15 लाख डुप्लिकेट वोटरों का खुलासा हुआ, फिर भी राहुल गांधी ने इस अभियान को अधूरा छोड़ दिया, जिससे कांग्रेस की गंभीरता पर सवाल उठे।
राहुल गांधी की गैरमौजूदगी और गलत संदेश
जब सीट बंटवारे की बातचीत सितंबर के अंत में निर्णायक मोड़ पर थी, राहुल गांधी लैटिन अमेरिका दौरे पर निकल गए ब्राज़ील, कोलंबिया, पेरू और चिली की यात्रा पर। बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने तंज कसा , ‘जब बिहार जल रहा है, राहुल गांधी कोलंबिया में कॉफी बनाना सीख रहे हैं।’
कांग्रेस ने राहुल के विदेशी दौरों की तस्वीरें जारी कर सफाई देने की कोशिश की, जहां वे ‘भारत की नष्ट होती वैज्ञानिक सोच पर चर्चा कर रहे थे लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।
13 अक्टूबर को जब लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव IRCTC घोटाले की सुनवाई के लिए दिल्ली पहुंचे, तेजस्वी ने कांग्रेस नेताओं से मुलाकात की, लेकिन राहुल गांधी ना मीटिंग में शामिल हुए, ना तस्वीर खिंचवाई, ना बयान दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कह गई।
मौके और जोखिम
इस बीच RJD और वाम दलों ने जमीनी मोर्चे पर बढ़त बना ली है। तेजस्वी यादव का 10 लाख नौकरियों का वादा युवाओं में असर डाल रहा है। वहीं, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
AIMIM को INDIA ब्लॉक में जगह नहीं मिली, इसलिए वह सीमांचल की 100 सीटों पर उतरने जा रही है जिससे मुस्लिम वोटों का बंटवारा तय है।
ऐसे माहौल में कांग्रेस की कमज़ोर संगठन क्षमता और अस्थिर नेतृत्व फिर से निर्णायक साबित हो सकते हैं।
7.9 करोड़ मतदाताओं वाला बिहार, जो हमेशा राजनीतिक भूचालों का केंद्र रहा है, INDIA ब्लॉक के लिए NDA की नीतीश–मोदी जोड़ी को चुनौती देने का बड़ा मौका है।
लेकिन अगर कांग्रेस ने फिर वही 2020 वाली गलतियां दोहराईं, सीटों की लालच, कमजोर प्रदर्शन और सहयोगियों की अनदेखी तो वह एक बार फिर जीत के दरवाजे पर हार की पटकथा लिख सकती है। यानी कि, शतरंज की बिसात सज चुकी है। मोहरे तैयार हैं। अब नवंबर बताएगा, कौन ‘राजनीतिक मात’ खाएगा।









