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Home मनोरंजन

Movie Review – It ends with us (2024): होंठों पे ऐसी बात मैं दबा कर चली आई !

दिल को छू ले वही फिल्म देखने लायक है बाकी तो सब टाइम पास है..ये फिल्म देखिये और खुश हो जाइये !

Parijat Tripathi by Parijat Tripathi
27 November 2024
in मनोरंजन
0
किसकी आसान है ज़िन्दगी यहां !

किसकी आसान है ज़िन्दगी यहां !

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इस साल एक फिल्म आई है Netflix में, नाम है -It ends with us (2024). देखने वालों को अच्छी लगी इसलिए उम्मीद है कि यहां पढ़ने वालों को भी अच्छी लगेगी.

मूल रूप से ये फिल्म It ends with us कॉलिन हूवर की लिखी किताब पर आधारित है. उन्होंने कई साल पहले ही ये किताब लिख दी और जैसी कॉलिन हुवर को भी उम्मीद नहीं थी, ये किताब बेस्ट सेलर के रूप में दर्शकों के बीच सराही गई.

घर में बच्चों के कहने पर जब ये नावेल पढ़ना पड़ा तो इस फिल्म को नेटफ्लिक्स पर विशलिस्ट में शामिल कर लिया. उसके बाद उसके बाद जब ये फिल्म देखी तो मज़ा ही आ गया. कहना ही पड़ा है कि ये फिल्म उम्मीद से बढ़कर अच्छी लगी. हाँ, एक बात ज़रूर अजीब सी है- क्यों आखिर इस फिल्म को रोमांस/ड्रामा कैटेगरी में शामिल किया गया है? सही है ये बात कि ये फ़िल्म किशोर प्रेम की मनमोहक कहानी के रूप में दिल को छूती है पर उससे कहीं अधिक यह फ़िल्म घरेलू हिंसा पर सवाल उठाती है.

ऐसी ही एक फिल्म जो डोमेस्टिक वॉयलेंस के चिंतनीय विषय पर ज़िन्दगी की कहानी सुनाती है, हिंदी में भी बनी है. काजोल की केंद्रीय भूमिका वाली इस फिल्म ‘दो पत्ती’ में जबरदस्ती मिलाया गया थ्रिल वाहियात लगा. इस और असफल मिलावट ने फ़िल्म के असली उद्देश्य को ही पीछे छुपा दिया. यहां इस फिल्म ‘इट एंड्स विथ अस’ में ऐसा नहीं है. यह फ़िल्म इस विषय पर अपनी संजीदगी को ईमानदारी से पेश करती है.

‘माँ जैसी नहीं बनूंगी’

लिली ब्लूम इस फ़िल्मी कहानी की केंद्रीय भूमिका का चरित्र है. उसने अपना बचपन अपनी माँ को अपने पिता की हिंसा का शिकार बनते देख कर बिताया है. आज हालत ये है कि वो अपनी माँ जैसा कभी बनना नहीं चाहती. उसको अपने पहले प्यार को भी खोना पड़ा है. एटलस उसकी किशोरावस्था का प्रथम प्रेम है पर अब वो उसके साथ बिताई खुशनुमा यादें लेकर जी रही थी.

फिर एक मोड़ आया

अचानक जीवन में एक मोड़ आता है और एक दिन एक बिन बुलाया मेहमान उसके जीवन में चला आता है. ये एक न्यूरो सर्जन है जिसका नाम है राइल. ये प्रेम इतना आसमानी होने लगता है कि दोनों शादी का फैसला कर लेते हैं. यहां से कहानी अपने असली रंग में आती है. वही लड़की जो अपनी माँ जैसा नहीं बनना चाहती थी वही आज उनके जैसा बनने को मजबूर हो जाती है. कहानी आगे बढ़ती है जिसमे लिली ब्लूम अपनी माँ की तरह ही अपने पति की हिंसा को झेलती हुई ज़िंदगी जीती चली जाती है.

बस इतना ही

आगे क्या होता है ये बेहतर हो कि आप यहां जानना न चाहें. आगे क्या हुआ, ये फिल्म में देखेंगे तो फिल्म का मज़ा आएगा. यहां जान लेंगे तो फिल्म देखने का मज़ा बिलकुल ही किरकिरा हो जाएगा. इस फिल्म में उम्मीद है कि आपको ब्लेक लाइवली का काम पसंद आएगा. हो सकता है आपको ये भी लगे कि शायद वो अपनी भूमिका के लिये वे कुछ बड़ी हैं. फ्लावर शॉप खोलने का सपना ले कर जिंदगी के रास्ते पर आगे बढ़ने वाली लिली ब्लॉसम ब्लूम के रोल के लिये ब्लेक लाइवली थोड़ा सा मेच्योर सी लगीं. बाकी सब बहुत मस्त है.

फैसला मुश्किल था

घरेलू हिंसा के सामने खड़े हो कर मुश्किल फैसला लेने वाली लिली के पैरों पर न उसका मातृत्व बेड़ियाँ डालता है न ही उसका प्रेम उसे रोक पाता है. उसे याद आता है कि बचपन में वो इस बात पर अपनी माँ से सवाल पूछ लिया करती थी और उसकी माँ कल की चिंता में अपने आज की आहुति दे रही थी. पर ये लिली थी अपनी माँ से अलग, जिसके लिए समस्या का अर्थ उसका समाधान है.

ये दो बहुत ख़ास दृश्य

फिल्म के दो दृश्य मर्म को स्पर्श करते हैं. पहला जब लिली का पहला प्यार एटलस उसकी ज़िंदगी में वापिस लौटा और वो उससे कहता है कि कभी दोबारा प्रेम में पड़ने की बात सोचना तो मुझे ही चुनना. और दूसरा दृश्य तब जब लिली अपनी बेटी का हवाला देते हुए अपने पति-दानव राइल को बताती है कि उसने ये बड़ा फैसला क्यों लिया !

एटलस और लिली के प्रेम वाले दृश्य चाहे वो किशोर वय के हों या जवानी के -ये दृश्य फ़िल्म की खासियत हैं. इनको याद करके शायद आपको लगेगा कि एक बार और देख लें इस फिल्म को. नेटफिल्क्स तो होगा ही आपके घर. देखिये और आप लोग चाहें तो नेटफ्लिक्स पर देख सकते है। देखकर दोस्तों को जरूर बताइयेगा कैसी लगी.

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