लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव बुधवार को खारिज हो गया। इस मुद्दे पर सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। जहां सरकार की ओर से प्रस्ताव को संसदीय परंपराओं के खिलाफ बताया गया, वहीं विपक्षी दलों ने सदन में निष्पक्षता और विपक्ष की आवाज दबाने का आरोप लगाया।
अमित शाह ने प्रस्ताव को बताया दुर्भाग्यपूर्ण
गृह मंत्री अमित शाह ने बहस के दौरान कहा कि स्पीकर पूरे सदन के होते हैं और उनकी भूमिका सभी सदस्यों के हितों की रक्षा करने की होती है। उन्होंने कहा कि जिस पद पर सभी दलों की सहमति से किसी व्यक्ति को चुना जाता है, उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना संसदीय परंपराओं के लिहाज से दुखद है।
उन्होंने याद दिलाया कि जब स्पीकर चुने गए थे, तब सत्ता और विपक्ष दोनों के नेता उन्हें चेयर तक लेकर गए थे। शाह ने कहा कि सदन के संचालन के लिए जो नियम बने हैं, उनका पालन करना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है और यदि कोई सदस्य नियमों के विरुद्ध आचरण करता है तो स्पीकर का कर्तव्य है कि वह कार्रवाई करे।
शाह ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय तक विपक्ष में रही है, लेकिन कभी भी स्पीकर की निष्ठा पर सवाल नहीं उठाया गया। उन्होंने इतिहास का जिक्र करते हुए बताया कि अतीत में भी कुछ अवसरों पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव आए थे, लेकिन ऐसे कदम दुर्लभ रहे हैं।
विपक्ष ने उठाए निष्पक्षता पर सवाल
कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने बहस के दौरान कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार विपक्षी नेताओं का माइक बंद कर दिया जाता है, जिससे उनकी बात सदन तक नहीं पहुंच पाती।
चन्नी ने कहा कि सदन की मर्यादा किसी व्यक्ति से बड़ी होती है और चेयर को पूरी तरह निष्पक्ष होकर सभी पक्षों को बोलने का अवसर देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष के अधिकारों की रक्षा करना भी स्पीकर की जिम्मेदारी है।
आरजेडी ने भी जताई चिंता
राष्ट्रीय जनता दल के सांसद अभय कुमार सिन्हा ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि उस दबाव के खिलाफ है, जो उनके अनुसार चेयर पर डाला जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में सदन की कार्यवाही के दौरान विपक्ष को पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार का विरोध करने से अधिक निगरानी रखने की होती है। उनके अनुसार संसद में विभिन्न प्रस्तावों और चर्चाओं को मंजूरी मिलने की प्रक्रिया पहले की तुलना में सीमित होती जा रही है।
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सदन में गरमाई रही बहस
स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। सत्ता पक्ष ने इसे संसदीय परंपराओं के विपरीत बताया, जबकि विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया। अंततः प्रस्ताव को सदन में समर्थन नहीं मिल पाया और इसे खारिज कर दिया गया।








