लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा कि संसद देश के लगभग 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्छा और उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि हर सांसद अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं, जरूरतों और अपेक्षाओं को लेकर सदन में आता है और उनका कर्तव्य है कि वे इन मुद्दों को प्रभावी तरीके से सामने रखें।
सदन को हर नागरिक की आवाज बनने का प्रयास
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि उनका लगातार प्रयास रहा है कि सभी सांसद संसदीय नियमों के तहत अपनी बात रखें। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने उन सदस्यों को भी बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जो सामान्यतः कम बोलते हैं या संकोच के कारण अपनी बात नहीं रख पाते। उनका मानना है कि संसद को समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना चाहिए।
सहमति और असहमति लोकतंत्र की ताकत
ओम बिरला ने कहा कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनों की मजबूत परंपरा रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि Article 93 of the Constitution of India के तहत लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव किया जाता है और सदन ने उन्हें दूसरी बार यह जिम्मेदारी सौंपी है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे सदन की कार्यवाही को निष्पक्षता और नियमों के अनुसार संचालित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
हंगामे और अनुशासनहीनता पर जताई चिंता
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन व्यवस्था बनाए रखना सभी सदस्यों की जिम्मेदारी है। उन्होंने कुछ सांसदों के व्यवहार पर चिंता जताते हुए कहा कि कागज फाड़ना, मेज पर चढ़ना या शोर-शराबा करना उचित नहीं है। ऐसे आचरण से सदन की गरिमा को नुकसान पहुंचता है और जनता के बीच गलत संदेश जाता है।
सदन की मर्यादा बनाए रखने का संकल्प
ओम बिरला ने कहा कि जब भी सदन में हंगामा होता है तो देश की जनता के मन में निराशा पैदा होती है। उन्होंने कहा कि वे समय-समय पर सदस्यों को नियमों का पालन करने के लिए मार्गदर्शन देते रहेंगे।
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अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकसभा की कार्यवाही संविधान, नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं के अनुसार ही चलेगी। उनका उद्देश्य सदन की मर्यादा और प्रतिष्ठा को लगातार मजबूत बनाए रखना है।








