समाज में गाली देना अब सिर्फ एक बुरा व्यवहार नहीं, बल्कि सामाजिक आदत बनता जा रहा है। एक हालिया सर्वे रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि देश में हर दूसरी-तीसरी बातचीत में अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल आम हो चुका है, और इसमें सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं और लड़कियां भी पीछे नहीं हैं।
यह सर्वे ‘सेल्फी विद डॉटर फाउंडेशन’ के संस्थापक और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के प्रोफेसर डॉ. सुनील जागलान द्वारा किया गया है। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों के 70 हजार लोगों की आदतों और भाषा व्यवहार का अध्ययन किया गया है।
दिल्ली सबसे ज्यादा गाली देने वाला राज्य
सर्वे के अनुसार, दिल्ली इस लिस्ट में सबसे ऊपर है, जहां 80% लोग बातचीत के दौरान गाली का इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद पंजाब (78%), उत्तर प्रदेश (74%) और बिहार (74%) जैसे राज्य हैं, जहां गाली एक आम बात बन चुकी है।

गाली देने वाले शीर्ष राज्य
दिल्ली: 80%
पंजाब: 78%
उत्तर प्रदेश: 74%
बिहार: 74%
राजस्थान: 68%
हरियाणा: 62%
महाराष्ट्र: 58%
गुजरात: 55%
मध्य प्रदेश: 48%
उत्तराखंड: 45%
कश्मीर: 15%
नॉर्थ ईस्ट व अन्य: 20–30%
महिलाएं और लड़कियां भी दे रही हैं गालियां
इस सर्वे का सबसे अप्रत्याशित और चिंता जनक पहलू यह है कि 30% लड़कियां और महिलाएं भी गाली देने की आदत से जुड़ी हैं। स्कूलों, कॉलेजों और यहां तक कि प्रोफेशनल संस्थानों में भी मां, बहन और बेटी के नाम पर गाली देना ‘सामान्य व्यवहार’ माना जाने लगा है।
कौन-कौन शामिल था सर्वे में?
इस सर्वे में शामिल किए गए लोगों में सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि माता-पिता, शिक्षक, पुलिसकर्मी, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, व्यापारी, पंचायत प्रतिनिधि जैसे समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल थे। इससे साफ पता चलता है कि गाली देने की प्रवृत्ति आयु, लिंग या पेशे तक सीमित नहीं रही।
क्या कहता है यह ट्रेंड?
विशेषज्ञों के अनुसार, गाली देना मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और भाषायी अनुशासन की कमी का संकेत है। जब यह व्यवहार सामान्य बन जाए तो समाज में सहनशीलता, मर्यादा और संवेदनशीलता का ह्रास होने लगता है।
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गाली देना कभी गुस्से या नाराज़गी की प्रतिक्रिया मानी जाती थी, लेकिन अब यह रोज़मर्रा की बोलचाल का हिस्सा बनती जा रही है। दिल्ली, पंजाब, यूपी और बिहार जैसे राज्यों में इसकी मात्रा चिंताजनक स्तर तक पहुंच गई है। यह समय है जब परिवार, शिक्षा संस्थान और समाज मिलकर इस पर चेतनात्मक पहल करें, ताकि अगली पीढ़ी को एक स्वस्थ और गरिमापूर्ण संवाद की संस्कृति दी जा सके।









