“जब कोई सिस्टम चुप हो जाए, तो जनता को बोलना पड़ता है” — यह बात एक बार फिर सच साबित हुई है, लीला साहू के हौसले और सोशल मीडिया की ताकत के चलते। नौ महीने की गर्भवती लीला साहू ने अपने गांव की जर्जर सड़क को लेकर आवाज उठाई, और अब परिणाम सामने है — उनके गांव की सड़क का निर्माण कार्य आखिरकार शुरू हो गया है।
लीला साहू, जो खुद एक डिजिटल इंफ्लुएंसर हैं, ने पिछले कुछ हफ्तों में कई वीडियो पोस्ट कर बगैया टोला से गजरी तक की बदहाल सड़क का सच सामने रखा। उन्होंने नेताओं से सीधा सवाल किया था — “अगर सड़क बनवा नहीं सकते थे, तो वादे क्यों किए?” इस सवाल ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी और सरकार को हरकत में आना पड़ा।
एक साल से कर रही थीं संघर्ष
लीला साहू ने पिछले एक साल में कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को सड़क निर्माण की गुहार लगाई थी। उनकी बातों को पहले गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन जब उन्होंने वीडियो में सड़क की भयावह स्थिति दिखाकर कहा कि “एंबुलेंस भी गांव तक नहीं पहुंच सकती”, तो सरकार की किरकिरी होने लगी।

राजनेताओं के बयान बने विवाद का कारण
इस पूरे प्रकरण के दौरान कुछ नेताओं के बयान भी विवाद का विषय बने। पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह और सांसद डॉ. राकेश मिश्रा द्वारा दिए गए बेतुके बयान सोशल मीडिया पर आलोचना के केंद्र बने। विपक्ष ने भी सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ा।
अब गांव की सड़क पर दौड़ रहीं जेसीबी और रोलर मशीनें
सोशल मीडिया के दबाव और जनआंदोलन के रूप में उभरे इस अभियान का असर अब जमीनी स्तर पर नजर आने लगा है। खड्डी खुर्द के बगैया टोला से गजरी को जोड़ने वाली सड़क की मरम्मत का काम शुरू हो गया है। खुद लीला साहू ने निर्माण कार्य का वीडियो शेयर करते हुए खुशी जाहिर की और कहा कि अब एंबुलेंस उनके घर तक आ सकेगी।
लीला साहू की जीत, सिस्टम की सीख
यह कहानी सिर्फ एक सड़क की नहीं, बल्कि उस जज्बे की है जो व्यवस्था को झकझोर सकता है। लीला साहू की कोशिशों से यह साबित हो गया कि एक आम नागरिक की आवाज भी बदलाव ला सकती है — बशर्ते वह डटे रहना जानता हो।
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अब उम्मीद है कि यह सड़क सिर्फ कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि जिम्मेदार शासन और जागरूक नागरिक की मिसाल बनकर उभरेगी।









