महाराष्ट्र के पुणे जिले में चार वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दोषी भीमराव कांबले को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि यह अपराध समाज की संवेदनाओं को झकझोरने वाला है और इसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों की श्रेणी में रखा जा सकता है।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए केवल आजीवन कारावास पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह घटना मई 2026 में पुणे जिले के नसरपुर क्षेत्र में हुई थी। आरोप है कि घर के बाहर खेल रही चार वर्षीय बच्ची को आरोपी अपने साथ ले गया, जहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। बाद में बच्ची का शव बरामद हुआ, जिसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की।
जांच के दौरान जुटाए गए तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया गया और उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया।
फास्ट ट्रैक कोर्ट में तेजी से पूरी हुई सुनवाई
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट में प्राथमिकता के आधार पर की गई। अदालत ने पहले आरोपी को दोषी करार दिया और बाद में सजा पर सुनवाई के बाद मृत्युदंड का फैसला सुनाया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह उन मामलों में शामिल है जिनमें जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम समय में पूरी हुई।

अदालत की टिप्पणी
फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि अपराध की प्रकृति बेहद क्रूर और अमानवीय है। न्यायालय ने माना कि ऐसे मामलों में कठोरतम दंड समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखने और पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने के लिए आवश्यक है।
अभियोजन पक्ष ने क्या कहा?
अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि उपलब्ध साक्ष्य, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य प्रमाण आरोपी के खिलाफ मजबूत हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि मुकदमे के दौरान आरोपी की ओर से अपने कृत्य पर किसी प्रकार का पश्चाताप दिखाई नहीं दिया।
बच्ची के परिवार को मिला न्याय
फैसला सुनाए जाने के समय पीड़ित परिवार अदालत में मौजूद था। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद अदालत के इस निर्णय को परिवार ने न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
महिला और बाल सुरक्षा पर फिर उठे सवाल
इस घटना ने एक बार फिर बच्चों की सुरक्षा, महिलाओं के खिलाफ अपराध और ऐसे मामलों में त्वरित न्याय की आवश्यकता पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि कठोर कानूनों के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, बच्चों की सुरक्षा शिक्षा और प्रभावी पुलिस व्यवस्था भी बेहद जरूरी है।
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पुणे की विशेष अदालत का यह फैसला बाल यौन अपराध और हत्या जैसे गंभीर मामलों में न्यायिक सख्ती का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। हालांकि किसी भी न्यायिक निर्णय से पीड़ित परिवार की क्षति की भरपाई संभव नहीं है, लेकिन कानून के दायरे में दोषी को कठोर दंड मिलना न्याय व्यवस्था में विश्वास बनाए रखने की दिशा में अहम कदम है।







