अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेज उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय रुपया एक बार फिर दबाव में नजर आया। गुरुवार को बाजार खुलते ही रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 95 के स्तर से नीचे पहुंच गया और दिन के दौरान अपने नए निचले स्तर के करीब कारोबार करता दिखा।
सुबह के सत्र में रुपया अपने पिछले बंद स्तर से कमजोर खुला और जल्द ही फिसलकर रिकॉर्ड निचले स्तर के आसपास पहुंच गया। विदेशी मुद्रा बाजार में यह गिरावट लगातार बढ़ते वैश्विक दबावों की ओर इशारा करती है।
गिरावट की बड़ी वजहें
रुपये पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट दोनों ही ऊंचे स्तर पर बने हुए हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, ऐसे में तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ जाती है। जब कंपनियां ज्यादा डॉलर खरीदती हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ता है।
इसके अलावा विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी रुपये को कमजोर कर रही है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और अनिश्चितता के माहौल में निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी का बहिर्वाह हो रहा है।
RBI की सीमित गुंजाइश
भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को संभालने की कोशिश करता है, लेकिन मौजूदा हालात में वैश्विक कारकों का असर ज्यादा भारी पड़ रहा है। बढ़ती तेल कीमतें और मजबूत डॉलर के सामने केंद्रीय बैंक के कदम सीमित असर ही दिखा पा रहे हैं।
आम लोगों पर असर
रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। विदेश यात्रा, पढ़ाई और अन्य खर्च महंगे हो जाएंगे क्योंकि डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने होंगे।
इसके साथ ही आयातित वस्तुएं जैसे स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो सकते हैं। तेल की लागत बढ़ने से देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की आशंका भी बनी हुई है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती और डॉलर की मजबूती कम नहीं होती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। आने वाले दिनों में निवेशकों की चाल और अंतरराष्ट्रीय हालात रुपये की दिशा तय करेंगे।









