बिहार कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. शकील अहमद ने रविवार को कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को एक विस्तृत पत्र लिखकर अपना त्यागपत्र सौंपा।
शकील अहमद ने पत्र में कहा कि उन्होंने यह निर्णय बहुत दुखी मन से लिया है, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि “मेरा किसी पार्टी में जाने का इरादा नहीं है। मैं आज भी कांग्रेस की विचारधारा और सिद्धांतों में अटूट विश्वास रखता हूं और जीवन का अंतिम वोट भी कांग्रेस के पक्ष में ही डालूंगा।”
लंबे राजनीतिक सफर का भावनात्मक अंत
पत्र में शकील अहमद ने अपने परिवार के कांग्रेस से जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके दादा स्व. अहमद गफूर 1937 में कांग्रेस के विधायक चुने गए थे, जबकि उनके पिता शकूर अहमद 1952 से 1977 तक पांच बार कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। उन्होंने लिखा, “1981 में पिता के निधन के बाद मैंने 1985 से अब तक कांग्रेस के टिकट पर पाँच बार विधायक और सांसद के रूप में जनता की सेवा की है।”
इस्तीफा देने की वजह
शकील अहमद ने बताया कि उन्होंने पहले ही पार्टी से अलग होने का निर्णय ले लिया था, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का मतदान पूरा होने के बाद ही इसकी घोषणा की, ताकि उनकी वजह से कांग्रेस को किसी प्रकार का नुकसान न हो। उन्होंने कहा, “मैं नहीं चाहता था कि मेरे निर्णय से मतदान से पहले कोई गलत संदेश जाए या पार्टी को पाँच वोट का भी नुकसान हो।”
उन्होंने यह भी बताया कि वे बीमार होने के कारण चुनावी प्रचार में शामिल नहीं हो सके, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि इस बार कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहेगा और गठबंधन की सरकार बनेगी।
“मतभेद कुछ व्यक्तियों से, नीतियों से नहीं”
पूर्व मंत्री ने अपने पत्र में लिखा कि उनका मतभेद पार्टी की नीतियों से नहीं बल्कि वर्तमान नेतृत्व में बैठे कुछ व्यक्तियों से है। उन्होंने कहा, “पार्टी की विचारधारा, गांधीवादी सोच और उसके सिद्धांतों पर मुझे हमेशा विश्वास रहा है और रहेगा।”
कांग्रेस के लिए बड़ा झटका
शकील अहमद का इस्तीफा बिहार कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। वे पार्टी के अनुभवी और प्रभावशाली चेहरों में से एक रहे हैं। वे केंद्रीय दूरसंचार मंत्री समेत कई अहम पदों पर रह चुके हैं और मधुबनी क्षेत्र में कांग्रेस के पारंपरिक आधार को मजबूत करने में उनकी बड़ी भूमिका रही है।
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राजनीतिक हलकों में इस इस्तीफे को कांग्रेस में बढ़ते असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि शकील अहमद के रुख से यह भी स्पष्ट है कि वे अब भी पार्टी की विचारधारा से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं।









