सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में गाजियाबाद के हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद न हो और वह लंबे समय से कृत्रिम जीवन समर्थन पर हो, तो उसके सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए ऐसा निर्णय लिया जा सकता है।
परिवार की याचिका पर हुई सुनवाई
यह मामला हरीश राणा के परिवार द्वारा दायर याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। परिवार ने अदालत से अनुरोध किया था कि हरीश को जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे जीवित रखने की प्रक्रिया को समाप्त करने की अनुमति दी जाए। उनका कहना था कि पिछले 13 वर्षों से उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
कॉलेज में दुर्घटना के बाद बिगड़ी हालत
हरीश राणा कॉलेज के दिनों में एक दुर्घटना का शिकार हो गया था, जिसमें उसके सिर में गंभीर चोट लगी थी। इस चोट के कारण उसके मस्तिष्क को भारी नुकसान पहुंचा और वह सामान्य स्थिति में वापस नहीं आ सका। घटना के बाद से ही वह बिस्तर पर है और मेडिकल सपोर्ट सिस्टम के सहारे जीवित है।
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ का फैसला
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हरीश को जिस तरह से जीवित रखा जा रहा है, वह मूल रूप से लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे ही है। अदालत ने कहा कि यदि मरीज स्वयं निर्णय लेने में सक्षम न हो, तो उसके परिवार को उसके हित में निर्णय लेने का अधिकार है।
एम्स में भर्ती कराने का निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हरीश राणा को आगे की प्रक्रिया के लिए दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल में भर्ती कराया जाए। वहां डॉक्टरों की निगरानी में सभी आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी।
30 दिन की पुनर्विचार अवधि हटाई
कोर्ट ने इस मामले में 30 दिनों की पुनर्विचार अवधि को भी समाप्त कर दिया। आमतौर पर ऐसे मामलों में फैसले के बाद एक निर्धारित समय दिया जाता है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने यह अवधि हटाने का निर्णय लिया।
2018 के फैसले को और स्पष्ट करने की कोशिश
अपने आदेश में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि वर्ष 2018 में आए “कॉमन कॉज” मामले के फैसले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए गए थे। इस नए फैसले में उन सिद्धांतों को और स्पष्ट तथा व्यावहारिक बनाने का प्रयास किया गया है।
भविष्य के मामलों के लिए दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में आने वाले ऐसे मामलों के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी तय किए हैं। अदालत ने कहा कि किसी मरीज का लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया मानवीय तरीके से और डॉक्टरों की निगरानी में चरणबद्ध ढंग से की जानी चाहिए। यह प्रक्रिया अस्पताल के अलावा घर पर भी की जा सकती है, बशर्ते कि पूरी तरह चिकित्सकीय निगरानी मौजूद हो।
प्रतिभाशाली युवक की बदली जिंदगी
अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि हरीश राणा एक प्रतिभाशाली छात्र था। लेकिन कॉलेज में हुई दुर्घटना के बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पिछले 13 वर्षों में उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।
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सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनी और मानवीय पहलुओं पर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।









