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Home भारत

अरावली पर क्यों हो रहा इतना बवाल? जानें इसका महत्व

भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियां पर नवंबर–दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में पेश पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट का विरोध हो रहा है।

Gautam Rishi by Gautam Rishi
22 December 2025
in भारत
0
अरावली पर सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई, इन्हें भेजा नोटिस - Panchayati Times

अरावली

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भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पहाड़ियां एक बार फिर सुर्खियों में हैं। नवंबर–दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली से जुड़े मामलों पर अहम सुनवाई करते हुए इनके संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कहा कि अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि देश की पर्यावरणीय सुरक्षा की एक मजबूत ढाल हैं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और समिति की भूमिका

शीर्ष अदालत ने खनन पर नियंत्रण के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों पर विचार किया। इस समिति का नेतृत्व पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने किया था, जिसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के वन विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। इसके अलावा भारतीय वन सर्वेक्षण, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल रहे।

अदालत ने पहले दिए गए अपने निर्देशों को दोहराते हुए कहा कि अरावली क्षेत्र के लिए सभी राज्यों में एक समान नीति लागू होना जरूरी है, ताकि संरक्षण में किसी तरह की असमानता न रहे।

सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट जिसका हो रहा विरोध

सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई रिपोर्ट जिसमें अरावली पहाड़ियों और अरावली रेंज को परिभाषित किया गया है।

अरावली पहाड़ियां: पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी ऊंचाई स्थानीय राहत से 100 मीटर या उससे ज्यादा हो, उसे अरावली पहाड़ियां कहा जाएगा और उसे ही खनन से संरक्षित किया जाएगा।

अरावली रेंज: दो या दो से ज़्यादा अरावली पहाड़ियां, जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी पर हों, और जिनकी दूरी दोनों तरफ सबसे निचली कंटूर लाइन की बाउंड्री के सबसे बाहरी पॉइंट से मापी गई हो, मिलकर अरावली रेंज बनाती हैं। समिति ने सिफारिश की कि एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में आने वाली पहाड़ियां एक श्रृंखला मानी जाएंगी और उसी के अनुसार उनकी सुरक्षा की जाएगी।

इन दो तथ्यों से यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम होगी और दो पहाड़ियों की बीच की दुरी 500 मीटर से अधिक होगी उसका खनन किया जाएगा।

12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ ही 100 मीटर की ऊँचाई की

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आँकड़े के अनुसार 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 यानी महज 8.7 प्रतिशत ही 100 मीटर की ऊँचाई के मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खनन के योग्य हो जाएगा और संरक्षण खो सकता है।

क्यों इतनी अहम हैं अरावली पहाड़ियां

अरावली पर्वतमाला दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है और करीब 37 जिलों में इसका विस्तार माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्षेत्र तीन बड़ी भूमिकाएं निभाता है—

  • मरुस्थलीकरण पर रोक: थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकने में अरावली एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है।
  • भूजल रिचार्ज: यहां की चट्टानें और वन क्षेत्र बारिश के पानी को जमीन में जाने में मदद करते हैं।
  • जैव विविधता का संरक्षण: कई दुर्लभ वनस्पतियां और जीव-जंतु इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं।

अनियंत्रित खनन पर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अरावली में बेतरतीब खनन पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। इससे न सिर्फ पहाड़ियों का स्वरूप बिगड़ रहा है, बल्कि भूजल स्तर गिरने, धूल प्रदूषण बढ़ने और स्थानीय जलवायु प्रभावित होने जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं।

संरक्षण के फायदे

  • पर्यावरण संतुलन बना रहेगा और जलवायु परिवर्तन के असर कम होंगे।
  • आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधन सुरक्षित रहेंगे।
  • वन्यजीव और जैव विविधता को संरक्षण मिलेगा।
  • क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत बची रहेगी।

संतुलन की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली का संरक्षण और विकास, दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जरूरत है संतुलित नीति की, जिसमें पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ स्थानीय लोगों के रोजगार और विकास के विकल्प भी सुनिश्चित किए जाएं।

यह भी पढ़ें: फिल्म ‘धुरंधर’ बॉक्स ऑफिस पर कमाई में भी निकला धुरंधर 

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि अरावली पहाड़ियों का संरक्षण केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि देश के सतत विकास और पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा सवाल है।

Tags: अरावलीअरावली पहाड़ियांअरावली रेंज
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