इंडियनऑयल नई दिल्ली 2025 विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप्स में भारत के लिए सोमवार का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। भाला फेंक F46 स्पर्धा में रिंकू हुड्डा ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 66.37 मीटर की दूरी तय कर स्वर्ण पदक जीत लिया, जबकि उनके साथी सुंदर सिंह गुर्जर ने रजत पदक हासिल किया।
लेकिन यह सिर्फ एक जीत की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, संकल्प और पुनर्जन्म की भी दास्तान है — एक ऐसा सफर जो एक छोटे से गाँव से शुरू होकर विश्व मंच पर पहुँचा।

“यह मेरा दिन था” — रिंकू
स्वर्ण पदक जीतने के बाद रिंकू ने मीडिया से बातचीत में कहा: “मैं अपने समर्थकों और परिवार का बहुत आभारी हूँ। उनकी उपस्थिति ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया। यह मेरा दिन था — सब कुछ मेरे अनुकूल था, परिस्थितियाँ, ऊर्जा, माहौल — सब कुछ।”
उनकी यह जीत सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का क्षण था।
जब हादसे ने रिंकू का हाथ छीन लिया, पर सपनों को नहीं
रिंकू की कहानी की शुरुआत हरियाणा के धरमार गाँव से होती है। एक कृषि उपकरण दुर्घटना में उन्होंने अपना एक हाथ खो दिया था। यह घटना पूरे गाँव के लिए एक सदमे की तरह थी। उनके चाचा वज़ीर सिंह हुड्डा ने कहा: “वह दिन हमारे लिए काला दिन था। गाँव में हफ़्तों तक सन्नाटा रहा। हमें लगा कि सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन आज जब हम देखते हैं कि रिंकू कहाँ पहुँच गया है, तो विश्वास नहीं होता।”
पत्थर उछालने से जेवलिन तक
रिंकू की खेल यात्रा की शुरुआत एकदम सामान्य थी। अपने घर के पास की झील में पत्थर उछालते-उछालते उन्हें थ्रोइंग में दिलचस्पी हो गई। चाचा बताते हैं: “दुर्घटना के बाद वह खाली समय में झील में पत्थर उछालता था। तभी हमें लगा कि उसमें कुछ खास है और उसे 9 साल की उम्र में रोहतक स्टेडियम भेज दिया।”
क्या वह नीरज चोपड़ा से बेहतर होता?
जब वज़ीर सिंह से पूछा गया कि अगर वह हादसा न होता तो क्या रिंकू आज और बड़ा खिलाड़ी बनता, उन्होंने कहा: “कौन जाने क्या होता! शायद वह नीरज चोपड़ा से भी बड़ा स्टार होता। लेकिन यह भी सच है कि वह जो कुछ भी आज है, वो इसी अनुभव और संघर्ष का नतीजा है। हम ईश्वर के आभारी हैं।”
गाँव से स्टेडियम तक — उत्सव का माहौल
जैसे ही यह खबर गाँव पहुँची कि रिंकू फाइनल में उतरने वाला है, पूरे गाँव को फ़ोन के माध्यम से सूचित किया गया। कई लोग तीन घंटे का सफर तय कर जेएलएन स्टेडियम पहुँचे। स्टेडियम में मौजूद दर्शकों के लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया।
भारत की उपलब्धियाँ और प्रतियोगिता की जानकारी
विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप्स 2025, 27 सितंबर से 5 अक्टूबर तक जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, नई दिल्ली में आयोजित की जा रही है। इस ऐतिहासिक आयोजन में 104 देशों के 1000+ पैरा एथलीट्स भाग ले रहे हैं और 186 पदक स्पर्धाएं हो रही हैं।
यह आयोजन न केवल भारत की अब तक की सबसे बड़ी पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता है, बल्कि लॉस एंजेल्स 2028 पैरालिंपिक के लिए एक महत्वपूर्ण क्वालीफायर भी है।
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रिंकू की यह जीत सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे आत्मबल और समर्थन से चमत्कार किए जा सकते हैं। रिंकू ने यह दिखा दिया कि हाथ भले ही चला जाए, हौसला अगर कायम हो, तो कोई भी ऊँचाई असंभव नहीं।









