यूपी पंचायत चुनाव: उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों से पहले योगी सरकार ने ग्रामीण निकायों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर बड़ा कदम उठाया है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में राज्य सरकार ने ‘राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ के गठन का फैसला किया है.
इस आयोग का मुख्य उद्देश्य त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को आरक्षण देने के लिए उनके सामाजिक और प्रशासनिक पिछड़ेपन का अध्ययन करना होगा.
सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार आयोग पंचायत स्तर पर सर्वेक्षण और अध्ययन करेगा. इसके आधार पर यह तय किया जाएगा कि किन क्षेत्रों में पिछड़े वर्ग की आबादी कितनी है और उन्हें कितना आनुपातिक आरक्षण मिलना चाहिए. माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव से पहले OBC आरक्षण को लेकर यह कवायद राजनीतिक और सामाजिक रूप से बेहद अहम साबित हो सकती है.
पंचायतवार होगा पिछड़े वर्ग का अध्ययन
प्रदेश में पंचायतों में आरक्षण की व्यवस्था उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1947 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम, 1961 के तहत लागू की जाती है. इसके अलावा आरक्षण और सीट आवंटन के लिए वर्ष 1994 की नियमावलियां लागू हैं, जिनके तहत ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के अध्यक्ष तथा सदस्यों के पदों का आरक्षण तय किया जाता है.
अब नया आयोग पंचायतवार आंकड़ों का विश्लेषण कर यह सिफारिश करेगा कि किस क्षेत्र में OBC समुदाय को कितनी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. सरकार ने साफ किया है कि आरक्षण संबंधित वर्ग की जनसंख्या के अनुपात में दिया जाएगा, लेकिन पिछड़े वर्गों के लिए कुल आरक्षण 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा.
सर्वे के जरिए तय होगी आबादी
राज्य सरकार ने कहा है कि यदि किसी क्षेत्र में पिछड़े वर्गों की आधिकारिक जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, तो आयोग सर्वेक्षण के माध्यम से उनकी संख्या निर्धारित कर सकेगा. इससे पंचायत चुनाव में आरक्षण निर्धारण अधिक पारदर्शी और कानूनी रूप से मजबूत माना जा रहा है.
संविधान के अनुच्छेद 243D के तहत राज्य सरकार को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों को स्थानीय निकायों में आरक्षण देने का अधिकार प्राप्त है. इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत यह आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा.
आयोग में होंगे पांच सदस्य
सरकार के अनुसार आयोग में कुल पांच सदस्यों की नियुक्ति की जाएगी. इनमें ऐसे लोगों को शामिल किया जाएगा जिन्हें पिछड़े वर्गों से जुड़े सामाजिक और प्रशासनिक मामलों की जानकारी हो. आयोग के अध्यक्ष के रूप में उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को नियुक्त किया जाएगा.
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आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल सामान्य रूप से छह महीने का होगा. उम्मीद जताई जा रही है कि आयोग अपनी रिपोर्ट पंचायत चुनाव से पहले सरकार को सौंप सकता है, जिसके बाद नई आरक्षण सूची जारी की जाएगी.









