देश की सरकारी तेल कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में शानदार मुनाफा दर्ज किया है। Hindustan Times की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने जनवरी-मार्च तिमाही में संयुक्त रूप से करीब 19,470 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग 41 फीसदी ज्यादा है।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाया मुनाफा
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद इन कंपनियों को बेहतर रिफाइनिंग और मार्केटिंग मार्जिन का फायदा मिला। फरवरी के अंत में ईरान संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़े थे, लेकिन बाद में कीमतों में कुछ नरमी आई। इसी का असर कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन पर भी देखने को मिला।
IOC और HPCL ने दिखाई मजबूत बढ़त
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने चौथी तिमाही में अपने शुद्ध लाभ में करीब 56 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की। कंपनी का मुनाफा बढ़कर 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। वहीं, HPCL का लाभ भी लगभग 46 फीसदी बढ़ा और कंपनी ने पूरे वित्त वर्ष में मजबूत प्रदर्शन किया।
इसके अलावा HPCL ने अपने शेयरधारकों के लिए डिविडेंड का भी ऐलान किया है। कंपनी ने प्रति शेयर अंतिम लाभांश घोषित करने के साथ अंतरिम डिविडेंड भी दिया है।
BPCL का तिमाही मुनाफा थोड़ा घटा
भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) का चौथी तिमाही का मुनाफा मामूली रूप से घटा है। हालांकि पूरे वित्त वर्ष में कंपनी का कुल लाभ काफी बेहतर रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीपीसीएल को ईंधन कीमतों पर नियंत्रण और बाजार परिस्थितियों का असर झेलना पड़ा।
ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का असर
हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार इजाफा किया गया है। तेल कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और आयात लागत बढ़ने से दबाव बना हुआ है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कंपनियां अभी भी पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस पर भारी नुकसान झेल रही हैं।
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अगले साल चुनौती बढ़ सकती है
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर वैश्विक स्तर पर युद्ध और ऊर्जा संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो अगले वित्त वर्ष में तेल कंपनियों के लिए मौजूदा प्रदर्शन दोहराना आसान नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंची रहने से कंपनियों की लागत और दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।









