अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत की विदेश नीति और सामरिक हितों पर भी पड़ता दिख रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ईरान स्थित चाबहार पोर्ट परियोजना से खुद को धीरे-धीरे अलग करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता रहा है, खासकर चीन और पाकिस्तान को संतुलित करने के लिहाज से।
चाबहार पर सियासत गरमाई
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता पवन खेरा ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि चाबहार कोई साधारण बंदरगाह नहीं है, बल्कि यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा समुद्री रास्ता देता है, जिससे पाकिस्तान को बायपास किया जा सकता है। इसके साथ ही यह चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को काउंटर करने का भी एक अहम जरिया रहा है।
पवन खेरा ने सवाल उठाया कि अमेरिका के दबाव के पहले संकेत पर ही चाबहार से पीछे हटने की खबरें भारत की विदेश नीति को कमजोर दिखाती हैं। उन्होंने पूछा कि आखिर कब तक भारत सरकार वॉशिंगटन को अपने राष्ट्रीय हित तय करने देगी। उनके मुताबिक, मुद्दा सिर्फ चाबहार पोर्ट या रूसी तेल का नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या भारत पर अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स में क्या दावा?
ईटी इंफ्रा की एक रिपोर्ट के अनुसार, चाबहार पोर्ट को विकसित करने में भारत की करीब एक दशक पुरानी और उतार-चढ़ाव भरी भागीदारी अब लगभग समाप्ति की ओर है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 12 जनवरी को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों को अमेरिका के साथ होने वाले सभी व्यापार पर 25 प्रतिशत तक टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका ने 29 सितंबर 2025 से चाबहार पोर्ट से जुड़े प्रतिबंधों को फिर से सख्त कर दिया था, जिससे भारत की रणनीतिक योजना को झटका लगा। हालांकि, भारत सरकार की ओर से इस पूरे मसले पर अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
भारत के लिए क्यों अहम है चाबहार पोर्ट?
चाबहार पोर्ट भारत के लिए केवल एक व्यावसायिक परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक बंदरगाह रहा है। इसके जरिए भारत को अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के बाजारों तक सीधी पहुंच मिलती है, वह भी पाकिस्तान की भूमि का इस्तेमाल किए बिना। यही वजह है कि यह पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नीति का अहम हिस्सा माना जाता रहा है।
इसके अलावा, चाबहार पोर्ट को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के जवाब के तौर पर भी देखा जाता है। इस परियोजना के जरिए भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहता था और मध्य एशिया में व्यापार व प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा था।
यह भी पढ़ें: महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव: बीएमसी में बीजेपी गठबंधन को बहुमत
अगर भारत वास्तव में चाबहार पोर्ट से पीछे हटता है, तो इसका असर न सिर्फ भारत-ईरान संबंधों पर पड़ेगा, बल्कि मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक पहुंच भी सीमित हो सकती है। फिलहाल सबकी नजरें सरकार के आधिकारिक रुख पर टिकी हैं, जो यह साफ करेगा कि भारत ने यह कदम मजबूरी में उठाया है या यह उसकी बदली हुई रणनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा है।









