बांग्लादेश इस समय राजनीतिक अस्थिरता, कट्टरवाद और हिंसा के गंभीर दौर से गुजर रहा है। देश में अल्पसंख्यक समुदाय, खासकर हिंदुओं पर हमलों की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इसी बीच मंगलवार, 30 दिसंबर को बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख नेता रहीं बेगम खालिदा जिया का ढाका में निधन हो गया।
उनके निधन के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि उनके बेटे और BNP के वरिष्ठ नेता तारिक रहमान आगामी आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। बांग्लादेश में फरवरी में आम चुनाव प्रस्तावित हैं।
विभाजन के बाद का सफर
1947 के बंटवारे के बाद खालिदा जिया का परिवार दिनाजपुर चला गया था। उनका जन्म नाम खालिदा खानम पुतुल था। उन्होंने दिनाजपुर मिशनरी स्कूल और दिनाजपुर गर्ल्स स्कूल से शिक्षा हासिल की। बाद में उनकी शादी पाकिस्तानी सेना के अधिकारी कैप्टन जियाउर रहमान से हुई। 1965 में विवाह के बाद वे पति के साथ पाकिस्तान चली गईं और इसी दौरान उन्होंने अपना नाम खालिदा जिया अपना लिया।
तीन बार संभाली प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी
खालिदा जिया ने बांग्लादेश की राजनीति में लंबा और प्रभावशाली सफर तय किया। वे तीन बार देश की प्रधानमंत्री बनीं। 1991 में उन्होंने पहली बार सत्ता संभाली और बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद फरवरी 1996 में उनका दूसरा, अल्पकालिक कार्यकाल रहा, जबकि तीसरी बार वे 2001 से 2006 तक प्रधानमंत्री रहीं।
भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते
खालिदा जिया की राजनीति का एक अहम पहलू भारत के प्रति उनका आलोचनात्मक और टकराव वाला रुख रहा। पाकिस्तानी पृष्ठभूमि और राष्ट्रवादी राजनीति के कारण भारत के साथ उनके संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहे। मार्च 2013 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के ढाका दौरे के दौरान उनसे मिलने से इनकार करना इसी रवैये का उदाहरण माना जाता है। उस समय उन्होंने आरोप लगाया था कि भारत की कांग्रेस नीत सरकार बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को ज्यादा समर्थन दे रही है।
पाकिस्तान और चीन को प्राथमिकता
अपने कार्यकाल के दौरान खालिदा जिया ने भारत की तुलना में पाकिस्तान और चीन के साथ रिश्तों को अधिक महत्व दिया। उन्होंने 1972 की भारत-बांग्लादेश मैत्री संधि को देश की संप्रभुता के खिलाफ बताया और 1996 की गंगा जल साझा संधि को भी कड़ी आलोचना का निशाना बनाया। चटगांव हिल ट्रैक्ट्स शांति समझौते का भी उन्होंने विरोध किया था।
आरोप लगते रहे कि उनके शासनकाल में भारत विरोधी संगठनों को बढ़ावा मिला और ढाका में आईएसआई की सक्रियता बढ़ी। साथ ही भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ उग्रवादी संगठनों को बांग्लादेश में पनाह मिलने की बातें भी सामने आईं।
भारत यात्राएं भी रहीं चर्चा में
हालांकि तमाम मतभेदों के बावजूद खालिदा जिया ने 2006 में प्रधानमंत्री रहते हुए भारत की आधिकारिक यात्रा की थी, जहां उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात की। इसके अलावा अक्टूबर 2012 में, जब वे विपक्ष की नेता थीं, उनकी भारत यात्रा भी काफी चर्चा में रही थी।
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खालिदा जिया के निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले चुनावों में उनका राजनीतिक विरासत किस रूप में आगे बढ़ती है और देश की दिशा क्या होगी।









